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    'डायन बताकर महिलाओं की हत्या जारी रही तो संवैधानिक लोकतंत्र नहीं बचेगा', सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अब जागने का समय

    Updated: Fri, 14 Aug 2026 07:06 AM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि डायन बताकर महिलाओं को प्रताड़ित करने जैसी कुप्रथाएं कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों के बावजूद जारी रही ...और पढ़ें

    'डायन बताकर महिलाओं की हत्या जारी रही तो संवैधानिक लोकतंत्र नहीं बचेगा'- सुप्रीम कोर्ट

    'डायन बताकर महिलाओं की हत्या जारी रही तो संवैधानिक लोकतंत्र नहीं बचेगा'- सुप्रीम कोर्ट

    HighLights

    1. कहा, संविधान में ऐसे समाज की परिकल्पना की गई है जो समानता, बंधुत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के सिद्धांतों पर हो आधारित 

    2. मौजूदा मामला इस बात की याद दिलाएगा कि अंधविश्वास और तर्कहीन मान्यताओं पर हमेशा न्याय की जीत होनी चाहिए

    पीटीआई, दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि डायन बताकर महिलाओं को प्रताड़ित करने जैसी कुप्रथाएं कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों के बावजूद जारी रहीं तो संवैधानिक लोकतंत्र कायम नहीं रह सकता।

    कोर्ट ने एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। ओडिशा में 1998 में दोषी ने एक सह आरोपित के साथ मिलकर एक महिला को उसके घर से घसीटकर बाहर निकाला और उस पर डायन होने का आरोप लगाते हुए बेरहमी से पिटाई की, जिससे महिला की मौत हो गई थी।

    एक असहाय महिला को डायन बताया गया

    न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि इस मामले की सुनवाई पूरी करते हुए हम केवल इतना कहना चाहेंगे कि इस मामले के तथ्यों ने इस कोर्ट की अंतरात्मा को गहराई से झकझोर दिया है। एक असहाय महिला को डायन बताया गया। उसकी बेटी पर उस घटना का क्या असर हुआ होगा, जिसने अपनी मां को बेहद क्रूर तरीके से मारे जाते हुए देखा, यह बेहद पीड़ादायक है।

    पीठ ने कहा कि देश के संविधान में ऐसे समाज की परिकल्पना की गई है जो समानता, बंधुत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के सिद्धांतों पर आधारित हो और महिलाओं के प्रति अपमानजनक किसी भी प्रथा को त्याग दिया जाए।

    पीठ ने कहा कि इसके बाद भी समाज के कुछ वर्गों में डायन बताकर महिलाओं को प्रताड़ित करने जैसी कुप्रथाएं अब भी जारी हैं। हमारे जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था कायम नहीं रह सकती, जहां इस तरह की अपमानजनक कुप्रथाएं कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों से बचती रहें।

    शीर्ष कोर्ट ने यह फैसला बालकू ओराम की अपील पर सुनाया

    कोर्ट को पूरी उम्मीद है कि मौजूदा मामला इस बात की याद दिलाएगा कि अंधविश्वास और तर्कहीन मान्यताओं पर हमेशा न्याय की जीत होनी चाहिए। शीर्ष कोर्ट ने यह फैसला बालकू ओराम की अपील पर सुनाया।

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    ओराम ने सितंबर 2022 में ओडिशा हाई कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने अधीनस्थ न्यायालय द्वारा अपीलकर्ता को दोषी ठहराए जाने और उम्रकैद की सजा दिए जाने के फैसले को बरकरार रखा था।