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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 26, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सत्ता परिवर्तन के बाद पहली मुलाकातों के भी कई सबक

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Updated: Mon, 26 May 2014 08:26 AM (IST)

मुंबई आतंकी हमले के घाव को पांच साल से ज्यादा हो चुके हैं। इस दौरान इस्लामाबाद में तीन हुक्मरान बदले, तो दिल्ली में भी दूसरी सरकार सत्ता संभालने जा रह ...और पढ़ें

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नई दिल्ली (जागरण ब्यूरो)। मुंबई आतंकी हमले के घाव को पांच साल से ज्यादा हो चुके हैं। इस दौरान इस्लामाबाद में तीन हुक्मरान बदले, तो दिल्ली में भी दूसरी सरकार सत्ता संभालने जा रही है। भारत पर हुए अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले के गुनाहगारों को सजा की कोशिशें अब भी अंजाम तक नहीं पहुंच पाई हैं। प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ से मंगलवार को होने वाली पहली मुलाकात में दोस्ती की तस्वीरों के साथ बातचीत की मेज पर 26/11 हमले के साजिशकर्ताओं को सजा की शर्ते भी साफ करनी होंगी।

नवाज शरीफ के भारत दौरे के लिए रवानगी से ऐन पहले भी मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज मोहम्मद सईद ने भारत और नरेंद्र मोदी के खिलाफ खूब जहर उगला। सईद ने रविवार को खुलेआम शरीफ के भारत दौरे और मोदी की मेहमान नवाजी मंजूर करने की मुखालिफत में तकरीरें की। निजाम के हर बदलाव के साथ पाकिस्तानी खेमा पुराने मुद्दों को भुला आगे बढ़ने की बात करता रहा है। पहले कारगिल और फिर मुंबई आतंकी हमले को पीछे छोड़ आगे बढ़ने की दलीलें पाक से आती रही हैं। सुलह और बातचीत की खातिर भारत भी इन मुद्दों पर तवज्जो की रोशनी घटाता-बढ़ाता रहा है, जबकि पुराने घाव और मुद्दे जस के तस बने रहे। महत्वपूर्ण है कि 2009 में मिस्त्र के शर्म-अल-शेख में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उस समय सत्ता में आए यूसुफ रजा गिलानी की मुलाकात के बाद साझा बयान में भारत घाटे की बातें कुबूल गया। इस बयान में भारत ने मान लिया कि आतंकवाद के बावजूद बातचीत की कवायद जारी रहेगी। इससे पहले 2004 के सत्ता परिवर्तन के बाद प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह और इस्लामाबाद की सत्ता पर 1999 से काबिज जनरल परवेज मुशर्रफ की पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी। इस मुलाकात के बाद जारी साझा बयान में पाकिस्तान यह वादा झटकने में कामयाब रहा था कि भारत आतंकवाद के कारण शांतिवार्ता को प्रभावित नहीं होने देगा।

इससे पहले 2004 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के इस्लामाबाद दौरे में भारतीय दबाव में पाकिस्तान को मानना पड़ा था कि आतंकवाद जारी रहा तो बातचीत संभव नहीं है। इतना ही नहीं क्यूबा के हवाना में अगस्त, 2006 में हुई मनमोहन-मुशर्रफ मुलाकात के बाद जारी साझा बयान में भारत ने पाकिस्तान को भी बराबरी से आतंकवाद का शिकार मान लिया। घरेलू मोर्चे पर पाकिस्तान अपने घर से उपजे आतंकवाद से परेशान है, जबकि भारत में आतंकवाद का बड़ा स्त्रोत सीमा पार मौजूद आतंकी मशीन है। तमाम मजबूरियों के बीच नई दिल्ली की सरकार बीते एक दशक में आतंकी हमले भी झेलती रही और वार्ता की मेज पर मुलाकातें भी करती रही।

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