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भरण-पोषण पर एमपी हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी, साथ रहने और संतान होने पर महिला का दावा नहीं होगा खारिज

Updated: Fri, 10 Jul 2026 07:34 PM (IST)

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि यदि कोई महिला लंबे समय तक पुरुष के साथ पत्नी की तरह रही हो और संतान हो, तो उसका भरण-पोषण का दावा केवल विवाह की तकनीकी वैधता पर खारिज नहीं किया जा सकता।

मप्र हाईकोर्ट (फाइल फोटो)

मप्र हाईकोर्ट (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद किया। 

  2. सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के फैसले का दिया हवाला।

  3. महिला के भरण-पोषण दावे पर नए सिरे से सुनवाई के निर्देश।

सुरेन्द्र दुबे, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि 'पत्नी' की व्याख्या केवल विवाह की तकनीकी वैधता तक सीमित नहीं हो सकती। यदि कोई महिला लंबे समय तक किसी पुरुष के साथ पत्नी की तरह रही हो और उनके संबंध से संतान का जन्म हुआ हो, तो उसके भरण-पोषण के दावे को केवल विवाह की वैधानिकता के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की एकलपीठ ने इसी सिद्धांत के आधार पर उमरिया फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए महिला के भरण-पोषण संबंधी आवेदन पर नए सिरे से सुनवाई करने के निर्देश दिए हैं।

फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दिया था दावा

रामकली कुशवाहा ने फैमिली कोर्ट के 25 जून 2019 के आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। फैमिली कोर्ट ने उन्हें विधिक पत्नी मानने से इन्कार करते हुए भरण-पोषण का दावा खारिज कर दिया था। हालांकि, दोनों पक्षों की नाबालिग पुत्री के लिए प्रतिमाह दो हजार रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुशील कुमार तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के एन. उषा रानी बनाम मूडुदुला श्रीनिवास (2025) मामले का हवाला देते हुए तर्क रखा कि ऐसे मामलों में कानून की व्याख्या सामाजिक न्याय और मानवीय दृष्टिकोण के अनुरूप की जानी चाहिए।

धारा 125 का उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा

हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट होता है कि महिला और प्रतिवादी मनोज कुशवाहा लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे और उनके संबंध से एक पुत्री का जन्म हुआ। ऐसे में केवल विवाह की वैधानिकता के आधार पर महिला के दावे को अस्वीकार करना उचित नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 का मूल उद्देश्य परित्यक्त महिलाओं, बच्चों और आश्रित माता-पिता को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। इसलिए ऐसे मामलों में संबंधों की वास्तविकता, साथ रहने की अवधि और उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

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नए सिरे से होगी सुनवाई

हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को महिला का आवेदन पुनः बहाल कर दोनों पक्षों को सुनवाई का पूरा अवसर देने और कानून के अनुरूप नया निर्णय पारित करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही दोनों पक्षों को 3 अगस्त को फैमिली कोर्ट में उपस्थित होने के लिए कहा गया है।