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प्रेम विवाह किया तो परिवार का भी 'हुक्का-पानी' बंद... रतलाम के गांव का तुगलकी फरमान, Viral Video के बाद जागा प्रशासन, जांच के आदेश

Updated: Tue, 27 Jan 2026 02:04 AM (IST)

रतलाम के पंचेवा गांव में प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों और उनके सहयोगियों के सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार का फैसला किया गया है। चौपाल में पारित इस प्रस्ताव क ...और पढ़ें

पंचेवा में बहिष्कार के फरमान को पढ़ता ग्रामीण युवक। (वीडियो ग्रैब)

पंचेवा में बहिष्कार के फरमान को पढ़ता ग्रामीण युवक। (वीडियो ग्रैब)

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संक्षेप में पढ़ें

डिजिटल डेस्क, इंदौर। रतलाम जिले के जावरा विकासखंड स्थित ग्राम पंचेवा में प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों और उन्हें सहयोग देने वालों के खिलाफ ग्रामीणों द्वारा सामाजिक एवं आर्थिक बहिष्कार का निर्णय लिया गया है। इस फैसले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रशासन हरकत में आया है। एसडीएम सुनील जायसवाल ने पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं।

ग्रामीणों द्वारा आयोजित चौपाल में प्रस्ताव पारित कर यह घोषणा की गई कि गांव में भागकर शादी करने या प्रेम विवाह करने वालों और उनके परिजनों का सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। निर्णय के अनुसार ऐसे परिवारों को किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया जाएगा और न ही मजदूरी, दूध जैसी आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके अलावा गांव के पंडित, नाई (केश शिल्पी) और अन्य सेवा प्रदाताओं को भी ऐसे परिवारों के यहां जाने से रोकने की बात कही गई।

शरण देने वालों पर भी प्रतिबंध

वायरल वीडियो में गांव का एक व्यक्ति यह कहते हुए नजर आ रहा है कि प्रेम विवाह करने वाले परिवारों को गांव से पूरी तरह अलग-थलग कर दिया जाएगा। बैठक में यह भी तय किया गया कि प्रेम विवाह में सहयोग करने वालों या बाहर से आकर विवाह करने वालों को शरण देने वालों पर भी यही प्रतिबंध लागू होगा। इस दौरान गांव के तीन परिवारों के नाम लेकर उनके सामाजिक बहिष्कार की सार्वजनिक घोषणा भी की गई।

संविधान देता है समानता और स्वतंत्रता का अधिकार

संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार भारतीय संविधान के मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 15 सामाजिक आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को निषिद्ध करता है। वहीं अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता और सामाजिक बहिष्कार जैसी प्रथाओं को समाप्त कर उन्हें दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखता है।

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कानूनी रूप से किसी भी व्यक्ति या परिवार को समाज से बाहर करने, आजीविका से वंचित करने या मूलभूत सेवाओं पर रोक लगाने का अधिकार किसी को नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई निर्णयों में यह स्पष्ट कर चुका है कि बालिगों द्वारा अपनी इच्छा से किया गया विवाह संविधान द्वारा संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आता है।