वाट्सएप मैसेज को माना 'मृत्युपूर्व कथन', इंदौर हाईकोर्ट ने तीन आरोपितों की जमानत ठुकराई
इंदौर हाई कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में तीन आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। मृतक के मोबाइल से मिले व्हाट्सएप संदेशों को कोर्ट ...और पढ़ें

इंदौर हाईकोर्ट भवन (फाइल फोटो)
HighLights
हाई कोर्ट ने तीन आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कीं।
मृतक के व्हाट्सएप संदेशों को 'मृत्युपूर्व कथन' माना गया।
कृषि भूमि विवाद में आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला।
डिजिटल डेस्क, इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में मृतक के मोबाइल से मिले व्हाट्सएप संदेशों को प्रथमदृष्टया महत्वपूर्ण ‘मृत्युपूर्व कथन’ (Dying Declaration) मानते हुए तीन आरोपितों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजे गए ये संदेश मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं और प्रथम दृष्टया आरोपियों की भूमिका की ओर संकेत करते हैं।
न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने धार के विशेष न्यायालय द्वारा 27 जुलाई को पारित आदेश को बरकरार रखते हुए विशेष न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपील भी निरस्त कर दी।
मौत से पहले पिता को भेजे थे तीन वाट्सएप मैसेज
मामला धार जिले के निवासी संतोष उर्फ लखन औसारी की आत्महत्या से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार कृषि भूमि विवाद को लेकर करण जाट, धर्मेंद्र जाट और उमेश जाट लगातार उसे प्रताड़ित कर रहे थे। आरोप है कि तीनों ने मृतक के साथ गाली-गलौज की, अपमानित किया और जान से मारने की धमकियां दीं।
बताया गया कि 7 मई को आत्महत्या से पहले संतोष ने अपने पिता के मोबाइल पर व्हाट्सएप के जरिए तीन संदेश भेजे थे। अभियोजन ने इन्हें अदालत में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया, जिसे हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण प्रथमदृष्टया ‘मृत्युपूर्व कथन’ माना।
मैसेज में आरोपितों के नाम का स्पष्ट उल्लेख
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मृतक द्वारा भेजे गए व्हाट्सएप संदेशों में तीनों आरोपियों के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। ऐसे में प्रथम दृष्टया यह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मामले की जांच और अभियोजन के पक्ष को मजबूत करता है।
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परिजनों के बयान से भी पुष्ट हुई अभियोजन की कहानी
अदालत ने यह भी माना कि जांच के दौरान मृतक के पिता और भाई के दर्ज बयान व्हाट्सएप संदेशों की पुष्टि करते हैं। दोनों ने बयान में कहा कि कृषि भूमि के पुराने विवाद को लेकर आरोपियों ने मृतक को लगातार धमकाया, अपमानित किया और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। अभियोजन का दावा है कि इसी प्रताड़ना से परेशान होकर संतोष ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया।
हाई कोर्ट ने इन परिस्थितियों को देखते हुए आरोपियों को राहत देने से इनकार करते हुए उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।