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ग्वालियर DRDE ने बढ़ाई देश की सुरक्षा ताकत, स्वदेशी ACADA से चंद पलों में होगी हवा में छिपे जहरीले रसायनों की पहचान

By Varun SharmaEdited By: Ravindra Soni
Published: Mon, 24 Aug 2026 11:30 PM (IST)

ग्वालियर के DRDE ने स्वदेशी ACADA सिस्टम विकसित किया है, जिससे भारत रासायनिक-जैविक हमलों का तत्काल पता लगाने वाला चौथा ...और पढ़ें

अकाडा सिस्टम।

अकाडा सिस्टम।

HighLights

  1. DRDE ग्वालियर ने स्वदेशी ACADA सिस्टम विकसित किया।

  2. भारत रासायनिक हमले का पता लगाने वाला चौथा देश बना।

  3. L&T द्वारा निर्मित 223 यूनिट सेना को मिलेंगी।

वरुण शर्मा, ग्वालियर। दुनिया में भारत अब चौथा ऐसा देश बन गया है, जो रासायनिक-जैविक हमलों की स्थिति में तत्काल भांपकर अलर्ट हो सकेगा। यह संभव हुआ है- अकाडा सिस्टम से। देश के रक्षा संस्थान डीआरडीओ (डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन) की ग्वालियर स्थित डीआरडीई लैब ने डिवाइस के रूप में ऑटोमैटिक केमिकल एजेंट डिटेक्टर और अलार्म (अकाडा) विकसित किया था, जो अब तैयार हुआ है।

पिछले साल तैयार हुई थी तकनीक

यह डिवाइस हवा में घुले केमिकल के बारीक कणों को भी कैच कर ऑडियो और वीडियो रूप में अलर्ट जारी करेगा। पिछले साल फरवरी में डीआरडीई ने इस तकनीक का हस्तांतरण किया था, जिसमें भारतीय सेना ने एलएंडटी (लार्सन एंड टुब्रो) कंपनी के साथ 223 यूनिट का 80 करोड़ रुपये का आर्डर साइन किया। एलएडटी कंपनी डिवाइस को तैयार कर चुकी है। इसे सेना को सौंपने की तैयारी है। यह बॉक्सनुमान डिवाइस है, जिसे कहीं भी ले जाया जा सकता है।

यह होगा लाभ

बता दें कि स्वदेशी रूप से विकसित किए गए अकाडा से जहां देश की सेनाओं और सुरक्षा बलों की अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक जरूरतें पूरी होंगी, वहीं इसका लंबे समय तक इस्तेमाल, बेहतर रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स-एक्सेसरीज की आपूर्ति भी सुनिश्चित हो सकेगी। यह उत्पाद आई-डीडीएम, 'मेक इन इंडिया' और 'आत्म निर्भर भारत' मिशन की दिशा में एक लंबी छलांग है।

इसलिए है इसकी आवश्यकता

दरअसल, रासायनिक हमले की स्थिति में जान-माल की हानि कम करने के लिए इसकी तत्काल पहचान जरूरी है। इसमें अकाडा डिवाइस अहम भूमिका निभाते हैं। अब तक भारतीय सशस्त्र बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को इन डिटेक्टर को दुनिया भर में उपलब्ध निर्माताओं (अमेरिका-जर्मनी) से आयात करना पड़ता था। स्वदेश में बने डिटेक्टर और अलार्म में 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी कंपोनेंट इस्तेमाल हुए हैं।

अकाडा यानी एसीएडीए ऐसे करेगा काम

यह डिवाइस आसपास की हवा का परीक्षण करके रासायनिक युद्ध एजेंटों (सीडब्ल्यूए) और विषैले औद्योगिक रसायनों (टीआईसी) का पता लगाएगा। यह दो संवेदनशील कोशिकाओं के साथ आयन मोबिलिटी स्पेक्ट्रोमेट्री (आइएमएस) का उपयोग करके एक ही समय में विषाक्त पदार्थों को ट्रैक करेगा। युद्ध के दौरान सैन्य सुरक्षा को बढ़ावा देगा तो वहीं शांति काल में औद्योगिक दुर्घटनाओं या आपदा राहत कार्यों में सहायता कर सकता है।

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इसमें बैटरी होती है और इसे वाहन पर भी माउंट (लगाया) किया जा सकता है। डिटेक्टर में केंद्रीय निगरानी स्टेशन पर डेटा प्राप्त करने के लिए रिमोट अलार्म यूनिट होती है। इसमें नेटवर्किंग क्षमता भी है। इसका लाइव केमिकल एजेंट्स पर डीआरडीई, ग्वालियर और टीएनओ नीदरलैंड्स में परीक्षण किया गया है।

सिर्फ तीन देशों के पास थी यह तकनीक

दुनिया में सबसे ज्यादा अकाडा सिस्टम अमेरिका के पास हैं। वहां की कंपनी स्मिथ डिटेक्शन ने इसे बनाया था। अमेरिकी सेना ने 1998 से अब तक 30,000 से ज्यादा अकाडा यूनिट खरीदी हैं। जर्मनी की ब्रुकर और एनवायरोनिक्स जैसी कंपनियां इयोन मोबिलिटी स्पेक्ट्रोमेंट्री तकनीक पर आधारित केमिकल डिटेक्टर बनाती हैं, जो नोटो देशों को सप्लाई होते हैं। ब्रिटेन के पास भी यह तकनीक है।