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    जिस पिता ने चार बच्चों को पाला, आखिरी सफर में कोई अपना नहीं आया; भोपाल के वृद्धाश्रम में दो दिन रखा रहा शव, पुलिस की मदद से अंतिम संस्कार

    Updated: Mon, 10 Aug 2026 08:04 PM (IST)

    भोपाल के 'अपना घर' वृद्धाश्रम में 70 वर्षीय घनश्याम की मौत के बाद उनके चार बच्चों में से कोई भी अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ, जिसके चलते दो दिन तक ...और पढ़ें

    अपनों ने मुंह मोड़ा तो वृद्धाश्रम के लोगों ने दी अंतिम विदाई। (AI Generated Image)

    अपनों ने मुंह मोड़ा तो वृद्धाश्रम के लोगों ने दी अंतिम विदाई। (AI Generated Image)

    HighLights

    1. 70 वर्षीय घनश्याम की मौत, बच्चों ने अंतिम संस्कार से किया इंकार।

    2. इंदौर में साइकिल के टायर-ट्यूब का थोक कारोबार करते मृतक घनश्याम।  

    3. चार साल पहले कोई परिजन उन्हें इंदौर से भोपाल लाकर बेसहारा छोड़ गया था।

    डिजिटल डेस्क, भोपाल। जिस पिता ने जिंदगी भर मेहनत कर अपने चार बच्चों को पाला, उनकी जरूरतें पूरी कीं और अपनी कमाई का हिस्सा उन्हें दे दिया, जिंदगी के आखिरी पड़ाव में वही पिता अपनों से इतना दूर हो गया कि उनकी मौत पर भी कोई चेहरा देखने तक नहीं पहुंचा।

    दो दिन रखा रहा शव

    भोपाल के ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में 70 वर्षीय घनश्याम की मौत के बाद दो दिन तक उनका शव इस उम्मीद में रखा रहा कि शायद कोई अपना आएगा। आश्रम प्रबंधन ने बेटे-बेटियों से संपर्क किया, लेकिन किसी ने भोपाल आने में असमर्थता जताई। परिवार की ओर से आश्रम से ही अंतिम संस्कार करने और बाद में डेथ सर्टिफिकेट भेजने को कहा जाता रहा। आखिरकार पुलिस की मदद से आश्रम प्रबंधन ने उनका अंतिम संस्कार कराया।

    स्वजन बनाते रहे बहाना

    आश्रम संचालिका माधुरी मिश्रा के मुताबिक, घनश्याम की मौत 4 अगस्त को हुई थी। इसके बाद उनके परिवार से संपर्क करने की कोशिश की गई। घनश्याम इंदौर के रहने वाले थे और वहीं उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं। परिवार के किसी सदस्य के पहुंचने की उम्मीद में शव को दो दिन तक रखा गया। इस दौरान परिजन कभी ट्रेन का टिकट नहीं मिलने, तो कभी बस में जगह नहीं होने की बात कहते रहे। बाद में जब यह स्पष्ट हो गया कि कोई आने वाला नहीं है तो पुलिस की मदद से अंतिम संस्कार कराया गया।

    बेटी ने कहा- संपत्ति में हिस्सा नहीं मिला

    माधुरी मिश्रा ने बताया कि परिवार से संपर्क करने पर एक बेटी ने अंतिम संस्कार में आने से इंकार करते हुए कहा कि पिता ने अपनी संपत्ति बेटों को दे दी थी और उसे कुछ नहीं मिला। ऐसे में वह अंतिम संस्कार के लिए क्यों आए? वहीं, बेटों की ओर से भी कहा गया कि ‘उन्होंने हमारे लिए किया ही क्या है।’ परिवार की ओर से लगातार आश्रम प्रबंधन से ही अंतिम संस्कार कराने के लिए कहा जाता रहा।

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    अंतिम संस्कार के बाद परिवार ने डेथ सर्टिफिकेट की मांग की। इस पर आश्रम संचालिका ने भी नाराजगी जताई। उनका कहना था कि जिस व्यक्ति के अंतिम संस्कार में परिवार का कोई सदस्य शामिल नहीं हुआ, उसके मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भी आश्रम पर दबाव नहीं बनाया जा सकता।

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    परिवार ने भोपाल लाकर छोड़ दिया था

    माधुरी के अनुसार, घनश्याम को करीब चार साल पहले परिवार का कोई सदस्य भोपाल लाकर छोड़ गया था। इसके बाद वे कई दिनों तक शहर में भटकते रहे। रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पर भीख मांगकर गुजारा करने लगे। बाद में कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से उन्हें ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम लाया गया। तब से वह यहीं रह रहे थे।

    घनश्याम इंदौर में साइकिल के टायर-ट्यूब का थोक कारोबार करते थे। उन्होंने जीवनभर मेहनत कर परिवार को संभाला, लेकिन आखिरी समय में उनके साथ कोई अपना नहीं था। मौत के बाद भी दो दिन तक आश्रम प्रबंधन उनके परिजनों का इंतजार करता रहा।

    माधुरी मिश्रा बताती हैं कि वृद्धाश्रमों के सामने बुजुर्गों की मौत के बाद सबसे बड़ी परेशानी शव को सुरक्षित रखने की होती है। ऐसे मामलों में परिवार के लोग साथ न हों तो आश्रम के लिए अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना भी चुनौती बन जाता है।