विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

आज जहां उमड़ता है भक्तों का सैलाब, कभी वहां रोजी-रोटी के लिए परेशान थे लोग... ऐसी है 'लालबागचा राजा' की कहानी

Published: Sun, 13 Sep 2026 02:30 PM (IST)

गणेश चतुर्थी का त्योहार पूरे भारत में, विशेषकर महाराष्ट्र में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। हालांकि, बात जब ...और पढ़ें

कैसे शुरू हुआ लालबागचा राजा का दरबार? (Image Source: AI-Generated)

कैसे शुरू हुआ लालबागचा राजा का दरबार? (Image Source: AI-Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 'गणपति बप्पा मोरया' की गूंज और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच, आखिर वो पल आ ही गया जिसका लाखों भक्तों को पूरे साल बेसब्री से इंतजार रहता है। जी हां, मुंबई की धड़कन कहे जाने वाले 'लालबागचा राजा' के दरबार से पर्दा उठ चुका है।

11 सितंबर की शाम 7 बजे जैसे ही बप्पा की पहली भव्य झलक दुनिया के सामने आई, पूरा पंडाल जयकारों और जश्न के माहौल में डूब गया। गणेश उत्सव में अब बस एक ही दिन बचा है, तो आइए जानते हैं कि इस बार लालबागचा राजा का दरबार कैसा सजा है और क्या है उनका वह ऐतिहासिक सफर जो भक्तों को खुशी-खुशी घंटों की लाइन में खड़े रहने पर मजबूर कर देता है।

Lalbaugcha Raja history

(Image Source: Instagram)

कैसा है इस बार बप्पा का शाही दरबार?

इस साल गणपति बप्पा को एक बेहद ही शानदार मंदिर की थीम वाले पंडाल में विराजमान किया गया है। पंडाल की नक्काशी और बारीकी देखने लायक है। सबसे खास बात यह है कि इस पर चांदी की परत चढ़ाई गई है, जिससे पूरा दरबार किसी शाही महल की तरह जगमगा रहा है।

वहीं अगर बप्पा के रूप की बात करें, तो उन्होंने अपना चिर-परिचित और पारंपरिक अंदाज ही अपनाया है। इस बार लालबाग के राजा ने संतरी रंग की धोती धारण की है। अपने भक्तों पर कृपा बरसाते और आशीर्वाद देते बाप्पा के इस मनमोहक रूप ने हर किसी को मंत्रमुग्ध कर दिया है।

कब से कब तक होंगे बप्पा के दर्शन?

अगर आप भी बप्पा का आशीर्वाद लेना चाहते हैं, तो बता दें कि लालबागचा राजा के दर्शन 14 सितंबर से शुरू होकर 25 सितंबर तक चलेंगे। पूरे 11 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भक्तों का सैलाब उमड़ने वाला है।

origin of Lalbaugcha Raja

(Image Source: Instagram)

कैसे शुरू हुआ 'लालबाग के राजा' का दरबार?

मुंबई के पुतलाबाई चॉल में सजने वाले इस पंडाल की कहानी 1900 के दशक से जुड़ती है। उस दौर में परेल का यह लालबाग इलाका कपड़ों की मिलों से भरा हुआ था। यहां 100 से ज्यादा मिलें थीं, जिस कारण इसे 'गिरनगांव' कहा जाता था।

1930 के दशक में जब औद्योगीकरण का दौर आया, तो टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बड़ा झटका लगा। यहां का पुराना बाजार बंद हो गया, जिससे स्थानीय व्यापारियों और मछुआरों के सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट आ गया। तब परेशान होकर लोगों ने गणपति बाप्पा से मदद की गुहार लगाई। कहते हैं कि बप्पा ने उनकी सुन ली और उन्हें एक नई जगह मिली, जहां आज का मशहूर 'लालबाग मार्केट' बसा हुआ है।

इसी मन्नत के पूरे होने की खुशी में लोगों ने 1934 में 'सार्वजनिक गणेश महोत्सव मंडल' की स्थापना की और बाजार का एक हिस्सा बप्पा की पूजा के लिए समर्पित कर दिया। तभी से लोग इन्हें अपने इलाके का 'राजा' और 'नवसाचा गणपति' यानी मन्नतें पूरी करने वाले गणेश मानते हैं।

मूर्ति बनाने वाले परिवार का है खास पेटेंट

क्या आप जानते हैं कि लालबागचा राजा की ये भव्य मूर्ति हर कोई नहीं बना सकता? शुरुआत से लेकर आज तक इसे सिर्फ 'कंबली परिवार' ही तैयार करता आ रहा है। वही इस मूर्ति का रखरखाव करते हैं और सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस मूर्ति के डिजाइन का पेटेंट भी इसी परिवार के नाम पर दर्ज है।

लालबागचा राजा पर लोगों की इतनी गहरी आस्था है कि वे अपनी मुरादें लेकर नवसाची लाइन में 24 से लेकर 40 घंटे तक बिना थके अपनी बारी का इंतजार करते हैं, ताकि उन्हें अपने राजा की एक झलक करीब से मिल सके।

यह भी पढ़ें- खत्म हुआ इंतजार! सामने आई लालबागचा राजा की पहली झलक, इस बार कैसा सजा है बप्पा का भव्य दरबार?

यह भी पढ़ें- अमृतसर का वो मंदिर, जिसे पहली नजर में Golden Temple समझ बैठते हैं लोग; रामायण काल से जुड़ा है इतिहास