न नक्शा बना, न बुलाया गया आर्किटेक्ट… फिर कैसे तैयार हुआ Baba Neem Karoli का कैंची धाम? पढ़ें अनसुनी कहानी
जानिए बाबा नीम करोली के विश्व प्रसिद्ध 'कैंची धाम' की वो अनसुनी कहानी, जिसकी नींव बिना किसी नक्शे के रखी गई थी।

कैसे श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना कैंची धाम? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड के मनोरम दृश्यों के बीच स्थित 'कैंची धाम' एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र है, जहां लोगों की गहरी आस्था बसती है।
साल 1942 की बात है। पूर्णानंद तिवारी नैनीताल की अदालत से एक मुकदमे के कागजात लेकर अपने गांव कैंची लौट रहे थे। कोई वाहन न मिलने की वजह से वे पैदल ही निकल पड़े। रास्ते में 'खुफिया डांड' नाम की एक जगह आई, जिसे भूतों का इलाका माना जाता था।
वहां पुलिया पर एक विशालकाय व्यक्ति कंबल ओढ़े लेटा था। तिवारी जी उसे देखकर बुरी तरह घबरा गए। हालांकि, तभी उस अजनबी ने उन्हें उनके नाम से पुकारा और पैदल चलने का कारण पूछा। डर दूर हुआ और उन्होंने उस संत के चरण स्पर्श किए।
संत ने कहा कि बेफिक्र होकर आगे जाओ, रास्ते में मदद के लिए एक ट्रक मिल जाएगा। जब तिवारी जी ने पूछा कि उनके दोबारा दर्शन कब होंगे, तो संत का जवाब था- "पूरे बीस साल बाद! अब जाओ।"

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कैंची धाम के अस्तित्व में आने की अनसुनी कहानी
ठीक दो दशक बाद, 25 मई 1962 को एक अद्भुत संयोग बना। बाबा नीम करोली महाराज, श्री तुलाराम साह और श्री सिद्धि मां के साथ रानीखेत से नैनीताल लौट रहे थे। उन्होंने अपनी गाड़ी कैंची गांव में रुकवाई और पूर्णानंद तिवारी को बुलवाया। बातचीत के दौरान तिवारी जी को तुरंत याद आ गया कि यह वही संत हैं जिनसे वे उस डरावनी रात में मिले थे। हालांकि, बाबा नीम करोली महाराज बिल्कुल अनजान बने रहे और कैंची गांव के बारे में पूछने लगे।
क्षिप्रा नदी के दूसरी तरफ एक घना जंगल था। यह वही जगह थी जहां कभी महान संत सोमवारी बाबा तपस्या करते थे और उनकी एक यज्ञशाला भी थी। बाद में प्रेमी बाबा का भी वहां निवास रहा। जानकारी के मुताबिक, महाराज जी अपने दल के साथ नदी पार करके उस जंगल में पहुंचे और एक शिला पर बैठ गए। उनके वहां बैठते ही मौजूदा कैंची धाम पवित्र हो गया और इसकी नींव पड़ गई।
सच साबित हुई बाबा नीम करोली की भविष्यवाणी
बाबा नीम करोली महाराज ने जंगल की घास साफ करवाकर उस पुरानी यज्ञशाला पर चबूतरा बनवाने का आदेश दिया। यही वह स्थान है जहां बाद में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की गई। इसके बाद धाम का विस्तार होता चला गया:
- मंदिरों की कतार: हनुमान जी के बगल वाले कमरे में श्री लक्ष्मी नारायण और तीसरे कमरे में शिव परिवार की स्थापना की गई।
- कीर्तन भवन: महाराज जी ने यहां श्री वैष्णवी देवी का मंदिर बनवाया।
- अद्वैत आश्रम: दक्षिण की तरफ चट्टानों और जंगल को साफ करके अद्वैत आश्रम बना, जिसमें विष्णु कुटी, कृष्ण-बलराम कुटी और गोविंद कुटी बनाई गईं।
15 जून 1973 को महाराज जी ने श्री विंध्यवासिनी देवी की प्राण-प्रतिष्ठा की। दरअसल, 15 जून का यह दिन महाराज जी ने मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा और धाम के उत्सव के लिए पहले से ही तय कर रखा था। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इस पूरे आश्रम का निर्माण बिना किसी आर्किटेक्ट या नक्शे के हुआ।
श्री कैंची धाम मंदिर ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट से मिली जानकारी के मुताबिक, सब कुछ सिर्फ महाराज जी के निर्देशों पर बन रहा था। निर्माण शुरू होने से पहले ही उन्होंने कह दिया था, "यहां एक ऐसा आश्रम और मंदिर बनेगा जिसकी ख्याति पूरी दुनिया में फैलेगी।"
15 जून को ही क्यों हुई बाबा नीम करोली की प्रतिमा की स्थापना?
बाबा नीम करोली महाराज के महाप्रयाण के बाद 1973-74 में भक्तों ने उनके अस्थि-कलश पर एक छोटा-सा समाधि मंदिर बनाने का विचार किया। उस समय महाराज जी की मूर्ति लगाने की कोई योजना नहीं थी। हालांकि बाद में, उनकी प्रेरणा और श्री सिद्धि मां की देखरेख में 1975 में समाधि कलश के ऊपर एक भव्य मंदिर का निर्माण शुरू हो गया।
इस मंदिर का निर्माण किसी पूर्व योजना के तहत नहीं हुआ, बल्कि यह धीरे-धीरे अपने आप आकार लेता गया। निर्माण कार्य की देखरेख करने वालों में कोई पेशेवर आर्किटेक्ट भी मौजूद नहीं था। बाबा नीम करोली महाराज की प्रतिमा को अंतिम रूप देने के लिए श्री सिद्धि मां और जीवंती मां ने दो-तीन बार जयपुर की यात्रा भी की। आखिर में, साल 1976 में श्री मां ने यह निर्णय लिया कि महाराज जी की प्रतिमा की स्थापना 15 जून को ही की जाएगी, क्योंकि बाबा ने पहले ही कैंची धाम के मुख्य उत्सव के लिए इसी तारीख को चुना था।
दिल्ली से कैसे पहुंचे कैंची धाम?
दिल्ली से कैंची धाम पहुंचने का सबसे आसान तरीका ट्रेन के जरिए है। जी हां, आप आनंद विहार या नई दिल्ली से काठगोदाम तक ट्रेन लें और वहां से 38 किमी दूर कैंची धाम के लिए सीधे शेयरिंग कैब या टैक्सी ले लें। अगर आप बस या अपनी गाड़ी से जाना चाहते हैं, तो दिल्ली के कश्मीरी गेट से हल्द्वानी या नैनीताल की बस पकड़कर या वाया मुरादाबाद-हल्द्वानी ड्राइव करके 7-8 घंटे में आसानी से धाम पहुंच सकते हैं।
Source: shreekainchimandirtrust.org
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