मद्रास हाई कोर्ट की छत पर आखिर क्यों बनाया गया था लाइटहाउस? कभी समुद्री जहाजों को दिखाता था रास्ता
मद्रास हाई कोर्ट की इमारत का इतिहास बेहद दिलचस्प है, जिसमें एक समय इसके केंद्रीय गुंबद से समुद्री जहाजों को रास्ता दिखाया जाता था। ...और पढ़ें

भारत की इस कोर्ट बिल्डिंग में छिपा था लाइटहाउस, 1977 तक जहाजों के काम आती रही रोशनी (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सुना है कि किसी अदालत की इमारत से समंदर में चलने वाले जहाजों को रास्ता दिखाया जाता हो? पढ़ने में यह किसी कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन यह बिल्कुल सच है।
चेन्नई में स्थित भारत के सबसे पुराने उच्च न्यायालयों में से एक, मद्रास हाई कोर्ट का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही दिलचस्प भी है। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक इमारत से जुड़े कुछ बेहद रोचक तथ्य।
महारानी विक्टोरिया के आदेश से हुई थी स्थापना
मद्रास हाई कोर्ट का गठन ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुआ था। ब्रिटिश संसद ने 'इंडियन हाई कोर्ट्स एक्ट, 1861' पारित किया था, जिसके बाद महारानी विक्टोरिया के 'लेटर्स पेटेंट' के जरिए कलकत्ता, बंबई और मद्रास में हाई कोर्ट स्थापित किए गए। मद्रास हाई कोर्ट का चार्टर 26 जून 1862 को जारी किया गया था और 15 अगस्त 1862 को यह अदालत पूरी तरह से अस्तित्व में आ गई।

(Image Source: Magnific)
सुप्रीम कोर्ट की पुरानी इमारत से हुई थी शुरुआत
शायद आप न जानते हों कि आज जो हाई कोर्ट की भव्य इमारत हम देखते हैं, शुरुआत में अदालत वहां नहीं लगती थी। 1862 से लेकर 1892 तक, यह कोर्ट पेरियामेट इलाके की उस इमारत से संचालित होता था, जहां पहले मद्रास का सुप्रीम कोर्ट काम करता था।
इंडो-सारसेनिक वास्तुकला का शानदार नमूना
मौजूदा हाई कोर्ट परिसर का निर्माण कार्य अक्टूबर 1888 में शुरू हुआ था और 1892 में यह बनकर तैयार हुआ। 12 जुलाई 1892 को इस नई इमारत का औपचारिक तौर पर उद्घाटन किया गया। यह इमारत अपने खूबसूरत इंडो-सारसेनिक वास्तुशिल्प, विशाल गुंबदों और बेहद बारीक नक्काशी के लिए जानी जाती है।
अदालत के केंद्रीय गुंबद में छिपा लाइटहाउस
इस इमारत का सबसे हैरान करने वाला और दिलचस्प हिस्सा इसका लाइटहाउस है। दरअसल, मद्रास हाई कोर्ट परिसर में 1844 से ही एक लाइटहाउस काम कर रहा था। जब नई अदालत का निर्माण हुआ, तो हाई कोर्ट के मुख्य गुंबद को ही एक लाइटहाउस के रूप में डिजाइन कर दिया गया।
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समुद्र तल से करीब 175 फीट की ऊंचाई पर मौजूद इस लाइटहाउस से समंदर में आने वाले जहाजों को एक महत्वपूर्ण संकेत मिलता था। शुरुआती दौर में यहां रोशनी के लिए 'केरोसिन वेपर लैंप' का इस्तेमाल किया जाता था। यह लाइटहाउस दशकों तक समुद्री जहाजों का मार्गदर्शन करता रहा। आखिरकार साल 1977 में, जब मरीना बीच पर एक नया लाइटहाउस शुरू हुआ, तब जाकर हाई कोर्ट के गुंबद वाले इस ऐतिहासिक लाइटहाउस का इस्तेमाल बंद कर दिया गया।