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कभी सोचा है गोल घेरे में ही क्यों करते हैं गरबा? शायद ही सुनी होगी इस लोकनृत्य से जुड़ी ये परंपरा

Published: Mon, 13 Jul 2026 05:04 PM (IST)Updated: Thu, 16 Jul 2026 01:29 PM (IST)

गुजरात का पारंपरिक लोकनृत्य गरबा के बारे में, तो सभी ने सुना ही होगा। यह नृत्य मुख्य रूप से नवरात्र ...और पढ़ें

क्यों खास है गुजरात का गरबा? (AI Generated Image)

क्यों खास है गुजरात का गरबा? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गरबा एक ऐसा नृत्य है, जिसका नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले नवरात्र और फिर गुजरात का नाम आता है। यह नृत्य गुजरात का पारंपरिक लोकनृत्य है, जो आज पूरे देश में काफी लोकप्रिय हो चुका है। शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने कभी गरबा न किया हो?

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस नृत्य को गोल घेरे में ही क्यों किया जाता है? आइए आज आपको बताते हैं कि इस डांस की शुरुआत कैसे हुई थी और इसकी खासियत क्या-क्या है? आइए जानें गरबा की कहानी।

कैसे हुई गरबा की शुरुआत?

गरबा गर्भ शब्द से बना है। पारंपरिक रूप से, इस नृत्य के बीच में मिट्टी के एक घड़े को रखा जाता है, जिसमें छोटे-छोटे छेद होते हैं और उसके अंदर दीपक जलाया जाता है। इस घड़े को गरबो कहा जाता है और इसके चारों ओर घूमकर गरबा किया जाता है। 

माना जाता है कि ये घड़े में जल रहा दीपक जीवन का प्रतीक है और इसके चारों ओर घूमकर नृत्य करना शक्ति की अराधना का प्रतीक माना जाता है। इस दीप के चारों ओर गरबा करना प्रकृति और शक्ति के नौ रूपों की अराधना माना जाता है। मां अंबा जो इस सृष्टि का आधार हैं, गरबा उन्हीं की अराधना के लिए किया जाता है।

क्या है गरबा की खासियत?

दूर से देखने में गरबा एक नॉर्मल डांस फॉर्म लग सकता है, लेकिन यह कई मायनों में खास है। गरबा हमेशा ग्रुप में खेला जाता है। गांव-समाज के लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं और एक साथ कदम और ताल मिलाकर गरबा खेलते हैं।  

इस डांस में पैरों की ताल, हाथों की ताल और घूमर का शानदार मेल देखने को मिलता है। लोग एक सर्कल में घूमते हैं और ताली बजाकर, कदम ताल मिलाकर एक साथ गरबा खेलते हैं। आमतौर पर इसके लिए किसी खास वाद्य यंत्र की जरूरत नहीं होती। हाथों की ताली, चुटकी और पैरों की गति ही इस डांस की असली खासियत हैं। 

शुरुआत में इसे धीमी गति से शुरू किया जाता है और धीरे-धीरे नृत्कों की गति बढ़ती है। गरबा में डांडिया का भी इस्तेमाल किया जाता है। डांडिया को आपस में टकराकर खेला जाता है, जिससे एक समूह में मधुर आवाज निकलती है। 

कैसा होता है पहनावा?

गरबा का पहनावा भी काफी खास होता है। महिलाएं रंग-बिरंगी चनिया-चोली पहनती हैं। ये पोशाक चटकीले रंगों के होती है, जिसपर मिरर वर्क, कौड़ियों और गोटा-पट्टी का का बहुत खूबसूरत काम किया होता है। इसके साथ ओढ़नी और ऑक्सीडाइज्ड या चांदी के गहने पहने जाते हैं। 

वहीं पुरुष गरबा के लिए केडियूं और धोती पहने हैं। केडियूं एक घेरदार कुर्ता होता है, जिसपर कढ़ाई और शीशे का काम होता है। इसके साथ वे रंग-बिरंगी गुजराती पगड़ी पहनेते हैं और ऑक्सीडाइज्ड जूलरी पहनते हैं।