खुद से अपना नाम लेकर करें बात! कैसे ये छोटी सी ट्रिक दूर कर सकती है आपकी बड़ी से बड़ी नर्वसनेस
स्ट्रेस और एंग्जायटी कम करने के लिए खुद से मैं नहीं, बल्कि अपना नाम या थर्ड पर्सन में बात करें। इससे घबराहट कम होती है। ...और पढ़ें

स्ट्रेस और घबराहट कम करेगी ये आसान ट्रिक (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। नौकरी का इंटरव्यू हो, स्टेज पर कोई बड़ा प्रेजेंटेशन देना हो या फिर जिंदगी की कोई और मुश्किल परीक्षा, ऐसे मौकों पर ऐन वक्त पर दिल की धड़कनें तेज होना और हाथ-पैर कांपना एक बहुत ही आम बात है। जब भी हम पर कोई सामाजिक या मानसिक दबाव आता है, तो हमारे अंदर एक बातचीत शुरू हो जाती है।
हम अक्सर खुद से पूछते हैं कि क्या मैं यह कर पाऊंगा? या अगर मुझसे कोई गलती हो गई तो क्या होगा? इससे जुड़ी ही एक दिलचस्प बात सामने आई है। दरअसल मनोविज्ञान के अनुसार, परेशानी या तनाव के इन पलों में मैं या मुझे जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना आपके तनाव को कई गुना ज्यादा बढ़ा देता है। ऐसे में सवाल आता है कि फिर खुद से कैसे बात करें? आइए जानें।
थर्ड पर्सन में करें खुद से बात
मैं या मुझे की जगह अगर आप खुद से बात करते समय अपने खुद के नाम का इस्तेमाल करें या खुद को तुम यानी एक तीसरे व्यक्ति की तरह संबोधित करें, तो आपका दिमाग अपने आप धीरे-धीरे शांत हो जाता है। ऐसा करने से मुश्किल हालातों में भी आपका परफॉर्मेंस बेहद शानदार हो सकता है।
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(AI Generated Image)
परफॉर्मेंस में होता है सुधार
जर्नल ऑफ पर्सनैलिटी एंड सोशल की रिपोर्ट के मुताबिक, खुद से अपना नाम लेकर बात करना परफॉर्मेंस को सुधारने का सबसे भरोसेमंद और कारगर तरीका है। इससे जुड़ी 7 अलग-अलग स्टडीज में पाया गया है कि जब लोग सामाजिक दबाव के समय खुद को तीसरे व्यक्ति के रूप में संबोधित करते हैं, तो उनका स्ट्रेस काफी तेजी से कम होता है। इतना ही नहीं, काम खत्म होने के बाद बार-बार अपनी गलतियों के बारे में सोचते रहने की आदत भी इससे काफी कम हो जाती है।
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यह छोटी सी तरकीब हमें चिंता पर लगाम लगाने और गलतियों के डर से मुक्ति दिलाने में मदद करती है। उदाहरण के लिए, इंटरव्यू रूम में जाने से ठीक पहले अगर आप खुद से कहें, तुमने बहुत अच्छी तैयारी की है और तुम अच्छा करोगे, तो यह आपकी घबराहट को तुरंत कम कर देता है।
बार-बार गलतियों के बारे में भी नहीं सोचते
जब आप खुद को तीसरे व्यक्ति की तरह देखते हैं, तो आप खुद को जज करना बंद कर देते हैं। इससे आपका पूरा फोकस गलती के डर पर रहने के बजाय सीधा आपके काम या लक्ष्य पर आ जाता है। आमतौर पर किसी घटना के बीत जाने के बाद भी लोग यही सोचते रहते हैं कि मैंने ऐसा क्यों किया, लेकिन नाम लेकर सोचने से दिमाग उस घटना को जल्दी भूलकर आगे बढ़ने में मदद करता है।
यह तरकीब दिमाग पर कैसे काम करती है?
दरअसल, जब हम किसी उलझन या परेशानी के समय खुद का नाम लेकर बात करते हैं, तो हमारा दिमाग उस मुश्किल परिस्थिति से एक साइकॉलोजीकल डिस्टेंस बना लेता है। रिसर्च के अनुसार, ऐसा करने पर हमारा दिमाग खुद को एक पीड़ित या घबराए हुए व्यक्ति के रूप में देखना बंद कर देता है।
इसके बजाय, वह खुद का ही एक सलाहकार या गाइड बन जाता है। इससे अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना और सही फैसले लेना बेहद आसान हो जाता है।