फिल्मी भोजपुरी गानों से बिल्कुल अलग है बिहार का ये देहाती गाना, गांव की यादों को बयां करता है ये मैथिली लोकगीत
बिहार का लोकगीत मैना के बच्चा चिल्होरिया रे... गांव की दोपहर और बचपन की याद दिलाता है।

लोकगीतों में झलकती है असली बिहारी संस्कृति (AI Generated Image)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के आपको हर मौके के लिए लोकगीत सुनने को मिल जाएंगे। शादी-ब्याह और त्योहारों के लिए तो गीत हैं ही, यहां आप रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े भी कई लोकगीत सुन सकते हैं। इन्हीं में मैना के बच्चा चिल्होरिया रे... भी शामिल है।
ये लोकगीत मिथिलांचल क्षेत्र में ज्यादा मशहूर है, जिसमें बचपन के मासूम दिनों की यादें घुली हैं। ये गीत गांव की दोपहरी और बच्चे की शरारत को बहुत ही खूबसूरत अंदाज में बयां करता है। आइए जानें इस लोकगीत के बारे में।
गांव में बीते बचपन के दिन
इस लोकगीत में एक बच्चा मैना पक्षी के बच्चे से बात कर रहा है और अपनी जामुन खाने की चाहत को बयां कर रहा है। गीत की शुरुआत में बच्चा मैना के बच्चे से कहता है मैना के बच्चा चिल्होरिया रे, मीठा जामुन गिरा…यानी तू पेड़ पर जा और वहां से जामुन गिरा, लेकिन याद रखना कि खराब जामुन मत गिराना, सिर्फ मीठे और पक्के जामुन गिराना वरना मारुंगा।
बचपन की जिद्द और स्कूल से चोरी
आगे की पंक्तियों में बच्चा कहता है एक दुपहरिया में जामुन खाएला अएलौं, स्कूल के सब काम काज छोड़ के पडैलों… यानी दोपहर की कड़ी धूप में बच्चा जामुन खाने के लिए आया है। इसके लिए उसने स्कूल का काम-काज और पढ़ाई-लिखाई भी छोड़कर भागते हुए बगीचे में आ गया है।
बच्चे का मासूम अधिकार
इसके आगे की पंक्ति में बच्चा कहता है नए देबे जामुन त मारबौ रे, तू त जामुन गिरा…। अब बच्चा पक्षी पर मासूमियत के साथ अपना अधिकार दिखा रहा है और कहता है कि अगर तूने मुझे जामुन नहीं दिया, तो समझो तुम्हारी खैर नहीं। ये पंक्ति एक बच्चे के मन की मासूमियत को दिखाता है कि वो जामुन खाने के लिए एक पक्षी से जिद्द कर रहा है।
गांव के जीवन को करता है बयां
इस लोकगीत में गांव के जीवन का बहुत ही खूबसूरती से वर्णन किया गया है। इस गीत में गर्मी के मौसम को बयां किया है। बच्चों की स्कूल की छुट्टियां पड़ने पर, दोपहर के समय वे अपने दोस्तों के साथ आम के बगीचे या जामुन तोड़ने निकल जाया करते थे।
ये गीत जामुन पाने के लिए बच्चे के दुलार और शरारत से भरा है। इस गीत में बच्चा किसी इंसान की तरह पक्षी से बात करता है, जो इस गीत को बहुत खूबसूरत बनाता है। जिन भी लोगों ने गांव में थोड़ा भी समय बिताया है, वो इस गीत से काफी कनेक्ट कर पाएंगे, क्योंकि गांव के जीवन को इस गीत में बहुत खूबसूरती के साथ बयां किया गया है।
ठेठ मैथिली भाषा की खूबसूरती
ये गीत मैथिली में गाया गया है, जिसमें ठेठ मैथिली शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। चिल्होरिया, मरबऊ, काज धाज जैसे शब्द इस गीत को बहुत खूबसूरत बनाते हैं और सीधा दिल में उतर जाते हैं। ये लोकगीत किसी किताब में नहीं लिखा है, बल्कि सालों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ रहा है।
