Louvre Museum का ये सच शायद ही जानते होंगे आप, कला का खजाना बनने से पहले था 'पेरिस' की हिफाजत करने वाला किला
लूव्र म्यूजियम, जो आज दुनिया की सबसे बड़ी कलाकृतियों का घर है, असल में 1190 में पेरिस की रक्षा के लिए एक किले के रूप में बनाया गया था। ...और पढ़ें

मोनालिसा से पहले भी लूव्र की थी अपनी कहानी, किले से म्यूजियम बनने तक का सफर है बेहद दिलचस्प (Image Source: Instagram)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पेरिस के लूव्र म्यूजियम का नाम आते ही जेहन में दुनिया की सबसे शानदार कलाकृतियों की तस्वीर उभर आती है, लेकिन क्या आपको मालूम है कि 10 अगस्त 1793 को पहली बार आम जनता के स्वागत के लिए तैयार हुआ यह म्यूजियम, असल में कला के लिए नहीं बल्कि युद्ध और सुरक्षा के लिए बनाया गया था?
इस विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय का इतिहास इसके म्यूजियम बनने की घटना से लगभग 600 साल पुराना है। आइए, जानते हैं इस ऐतिहासिक इमारत के फर्श से अर्श तक के सफर की पूरी कहानी।

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पेरिस की रक्षा के लिए बना था यह किला
बात साल 1190 की है। फ्रांस के तत्कालीन राजा फिलिप ऑगस्ट ने पेरिस शहर को बाहरी हमलों से सुरक्षित रखने के लिए एक मजबूत किले का निर्माण करवाया था। यही किला आज का लूव्र है।
समय के साथ इसकी भूमिका बदलती गई। 1364 आते-आते इसे राजशाही परिवार के रहने की जगह में बदल दिया गया। इसके बाद 16वीं शताब्दी में राजा फ्रांसिस प्रथम ने एक बड़ा बदलाव किया। उन्होंने इस पुराने ढांचे को गिराकर यहां पुनर्जागरण शैली का एक शानदार महल बनवाना शुरू कर दिया। आने वाले राजाओं ने भी इस महल के विस्तार का काम जारी रखा, जिससे यह एक विशाल और भव्य शाही महल में तब्दील हो गया।
शाही शौक ने रखी कला के खजाने की नींव
आज आप लूव्र में जो बेशकीमती कलाकृतियां देखते हैं, उन्हें सहेजने की शुरुआत फ्रांसीसी राजघरानों ने ही की थी। राजा फ्रांसिस प्रथम को कला से बेहद लगाव था। इसी शौक के चलते उन्होंने इटली से कई बेहतरीन पेंटिंग्स खरीदीं और महान चित्रकार लियोनार्डो दा विंची को भी फ्रांस बुला लिया। धीरे-धीरे इस शाही कलेक्शन में माइकल एंजेलो और राफेल जैसे दुनिया के सबसे मशहूर कलाकारों का काम भी जुड़ता चला गया।
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फ्रांस में कैसे खुला इतिहास का सबसे खास संग्रहालय?
फ्रांस में जब क्रांति का दौर चला, तो 1791 में इस शाही महल को पूरी तरह से कला को समर्पित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। इसके ठीक दो साल बाद, 10 अगस्त 1793 को इसे एक संग्रहालय के रूप में आम लोगों के लिए खोल दिया गया। उस समय वहां ऐसी खास व्यवस्था की गई थी कि नए कलाकार वहां आकर पुरानी और महान कृतियों का बारीकी से अध्ययन कर सकें और उनकी नकल बनाना सीख सकें।
नेपोलियन के राज में सजा 'नेपोलियन म्यूजियम'
- नेपोलियन बोनापार्ट के राज में इस म्यूजियम ने एक अलग ही रफ्तार पकड़ी।
- साल 1803 में इसका नाम बदलकर 'नेपोलियन म्यूजियम' कर दिया गया।
- नेपोलियन के शासन में यूरोप के अलग-अलग कोनों से बेशुमार कलाकृतियां फ्रांस लाई गईं और इस म्यूजियम का हिस्सा बनीं।
हालांकि, यह दौर ज्यादा समय तक नहीं टिका। 1815 में नेपोलियन की हार के बाद, करीब 5,000 कलाकृतियों को उनके असली देशों को वापस सौंप दिया गया।
जब लूव्र से अचानक गायब हो गई 'मोनालिसा'
लूव्र का इतिहास मशहूर पेंटिंग 'मोनालिसा' के बिना अधूरा है। 1516 में जब लियोनार्डो दा विंची फ्रांस आए, तो यह पेंटिंग उनके साथ ही थी। 1519 में उनके निधन के बाद यह फ्रांसीसी शाही खजाने का हिस्सा बन गई और 1797 के आसपास इसे लूव्र में लोगों के देखने के लिए लगा दिया गया। कहानी में असली रोमांच 21 अगस्त 1911 को आया, जब यह बहुमूल्य पेंटिंग म्यूजियम से रहस्यमयी तरीके से चोरी हो गई।
पेंटिंग बेचने की कोशिश में पकड़ा गया मास्टरमाइंड
पेंटिंग चुराने वाला कोई और नहीं, बल्कि म्यूजियम का ही एक पुराना कर्मचारी विंचेंजो पेरुगिया था। उसने पेंटिंग को एक सफेद कपड़े में लपेटा, बाहर निकाला और अपने कमरे में जाकर छिपा दिया। यह पेंटिंग करीब दो साल तक गायब रही। पुलिस की जांच का दायरा इतना बड़ा था कि शक के आधार पर मशहूर चित्रकार पाब्लो पिकासो और कवि गिलॉम अपोलिनेयर से भी पूछताछ की गई।
1913 में पेरुगिया इस पेंटिंग को लेकर इटली के फ्लोरेंस शहर पहुंचा और इसे एक कला व्यापारी को बेचने का प्रयास किया। ऐसे में, व्यापारी को शक हुआ तो उसने विशेषज्ञों को बुला लिया, जिन्होंने असली पेंटिंग को पहचान लिया।
पेरुगिया को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और जनवरी 1914 में 'मोनालिसा' की शान से फ्रांस वापसी हुई। बता दें, इस चोरी की घटना ने 'मोनालिसा' को सिर्फ एक पेंटिंग से दुनिया की सबसे चर्चित और लोकप्रिय कलाकृति बना दिया, जिसे देखने आज दुनिया भर से लोग लूव्र पहुंचते हैं।