एक बार फिर पतंगों से सजेगा लाहौर का आसमान, 18 साल बाद मनाया जाएगा काइट फेस्टिवल
लंबे इंतजार के बाद पाकिस्तान के लाहौर में पतंग उड़ाने की अनुमति मिली है। सरकार ने इस साल वहां के ...और पढ़ें

लाहौर में पतंग उड़ाने की मिली अनुमति, लेकिन इन सख्त नियमों का करना होगा पालन (Image Source: AI-Generated)
HighLights
पाकिस्तान के लाहौर में पतंग उड़ाने पर बैन लगा हुआ था
लाहौर सरकार ने पतंग उड़ाने के प्रतिबंध को हटा दिया है
इन सख्त नियमों से पतंग उड़ाने की अनुमति मिली है
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लाहौर में एक बार फिर रंग-बिरंगी पतंगें उड़ने को तैयार हैं। करीब 18 साल के लंबे इंतजार के बाद वहां की सरकार ने बसंत पर लगा प्रतिबंध हटा दिया है, जिससे शहर में खुशी और उत्साह का माहौल बन गया है। 6 से 8 फरवरी तक बसंत मनाया जाएगा।
हालांकि इस बार त्योहार सख्त सुरक्षा नियमों के साथ आयोजित हो रहा है। चलिए इस आर्टिकल में जानते हैं पतंग उड़ाने के कुछ नियमों के बारे में।
पतंग उड़ाने के लिए क्या-क्या नियम हैं?
सरकार ने साफ किया है कि आसमान में वही पतंग उड़ेगी, जिसकी डोर सूती होगी। कांच या धातु लगी डोर पूरी तरह मना है। बड़ी पतंगों, पटाखों और तेज गाने बजाने पर भी रोक है। पतंग बनाने वालों को प्रशासन के पास रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा।
साथ ही, केवल मजबूत और सुरक्षित छतों पर ही पतंग उड़ाने की अनुमति दी गई है और एयरपोर्ट व सेंसिटिव जगहों पर पतंग उड़ाने की मनाही है। इतना ही नहीं, नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई भी की जाएगी। कई इलाकों में स्थानीय लोग खुद भी निगरानी के लिए वॉलंटियर ग्रुप बना रहे हैं।
क्यों लगा था प्रतिबंध?
2000 की शुरुआत में बसंत के दौरान पतंग की डोर की वजह से कई हादसे हुए थे, जिसमें कई लोगों की जान चली गई और कुछ लोगों को गंभीर चोट भी आई थी। इसी वजह से साल 2007 में सरकार ने बसंत में पतंग उड़ाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद एक पूरी पीढ़ी ऐसी रही जिसने बसंत के बारे में सिर्फ कहानियों में सुना।
बसंत का इतिहास
बसंत की जड़े प्राचीन काल से जुड़ी हुई हैं। यह त्योहार प्राचीन बसंत पंचमी से जुड़ा हुआ है, जिसका जश्न पूरे भारत में मनाया जाता था। मुख्य रूप से भारतीय पंजाब और उत्तर भारत से संबंध रखने वाला यह पर्व बसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
वहीं, लाहौर में इस पर्व ने अपनी एक अलग पहचान बनाई। पुराने दौर में मुगल काल के दौरान यहां केसरिया रंगों से सजावट की जाती थी और किले पर पतंगे उड़ाई जाती थीं।
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