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आज खेसारी लाल और पवन सिंह के गानों पर होता है 'ऑर्केस्ट्रा', लेकिन बिहार में कैसे हुई थी इस डांस की शुरुआत?

Published: Thu, 03 Sep 2026 03:23 PM (IST)Updated: Tue, 08 Sep 2026 08:12 AM (IST)

ऑर्केस्ट्रा डांस बिहार के हर खास अवसर पर आयोजित किया जाता है। इस डांस की शुरुआत से जुड़ी कहानी बेहद दिलचस्प है।

कैसे शुरू हुआ बिहार का ऑर्केस्ट्रा डांस? (AI Generated Image)

कैसे शुरू हुआ बिहार का ऑर्केस्ट्रा डांस? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ऑर्केस्ट्रा डांस आज बिहार की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है, जो हर खास अवसर, जैसे- शादी-ब्याह, मुंडन आदि के मौके पर आयोजित किया जाता है। पवन सिंह और खेसारी लाल यादव जैसे कलाकारों के सुपरहिट भोजपुरी गानों पर महिला डांसर्स का जोरदार डांस ही ऑर्केस्ट्रा की खासियत है, जिसे वहां के लोग खूब पसंद करते हैं। 

सिर्फ बिहार ही नहीं, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और झारखंड में भी ऑर्केस्ट्रा डांस काफी मशहूर है। हालांकि, क्या आप ये जानते हैं कि इस डांस की शुरुआत कैसे हुई थी? आइए जानें बिहार के ऑर्केस्ट्रा डांस के शुरू होने की कहानी।  

कैसे हुई ऑर्केस्ट्रा डांस की शुरुआत?

बिहार में आज जिसे हम ऑर्केस्ट्रा डांस की तरह देखते हैं, उसकी जड़ें पारंपरिक लोक-नाटक शैली के लौंडा नाच से जुड़ी हैं। भोजपुरी के शेक्सपियर कहलाने वाले भिखारी ठाकुर ने समाज में बदलाव लाने के लिए लौंडा नाच की शुरुआत की थी। लौंडा नाच पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन और लोकगीतों पर किया जाता था और इसे सिर्फ पुरुष करते थे। पुरुष ही महिलाओं का भेष लेकर नाटक और नृत्य किया करते थे। 

हालांकि, वक्त के साथ समाज में काफी बदलाव आए और पैसे कमाने के लिए महिलाओं को डांस में शामिल किया जाने लगा। इन महिलाओं को प्राइवेट पार्टीज आदि में डांस करने के लिए बुलाया जाने लगा। वक्त के साथ पारंपरिक वाद्य यंत्रों की जगह इलेक्ट्रिक साउंड सिस्टम ने ले ली। 1980 के दशक में जब फिल्मी गानों के एलब्म का चलन बढ़ा, तो पारंपरिक गीतों को फिल्मी गानों ने रिप्लेस करना शुरू कर दिया। ऐसे ही धीरे-धीरे पारंपरिक लोक-नाट्य से आधुनिक व्यावसायिक ऑर्केस्ट्रा की शुरुआत हुई। 

कब होता है ऑर्केस्ट्रा डांस?

ऑर्केस्ट्रा डांस का सबसे बड़ा मकसद मनोरंजन है। गांव-देहात में मनोरंजन की साधन की कमी के कारण खास अवसरों पर ऑर्केस्ट्रा का आयोजन किया जाता था, जहां गांव के लोग इकट्ठा होते और एक तरह से यह सार्वजनिक उत्सव बन जाता।

शादी या शुभ अवसरों पर ऑर्केस्ट्रा का आयोजन करना आज परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक दबदबे का प्रतीक बन चुका है। आर्थिक रूप से समृद्ध परिवार अपने घर के खास अवसरों पर ऑर्केस्ट्रा का आयोजन करवाते हैं, जिसे देखने गांव के लोग इकट्ठा होते हैं। 

ऑर्केस्ट्रा का सांस्कृतिक महत्व क्या है?

शुरुआत में इस तरह के संगीत और नृत्यों का महत्व समाज के बारे में लोगों तक संदेश पहुंचाना था। लौंडा नाच और पारंपरिक लोकगीतों के जरिए प्रवास, दहेज प्रथा, नशाखोरी जैसे मुद्दों के खिलाफ आवाज उठाई जाती थी। ये डांस लोगों से जुड़ने का एक जरिया बनते थे। हालांकि, समय के साथ इसके मकसद और तरीके में काफी बदलाव आ चुका है।

समय के साथ कैसे बदला रूप?

समय के साथ ऑर्केस्ट्रा डांस में कई नकारात्मक बदलाव भी आए। पारंपरिक गीतों की जगह अब कई अश्लील गानों पर भी महिलाओं को नचाया जाता है। ऑर्केस्ट्रा डांसर की सामाजिक स्थिति भी काफी बिगड़ चुकी है। इन नृतकियों के साथ दुर्व्यवहार और ट्रैफिकिंग के मामले भी सामने आ चुके हैं।