सिर्फ राधा-कृष्ण ही नहीं, देवर-भाभी की नोकझोंक भी है 'रसिया' का हिस्सा, दिलचस्प है इस लोकगीत की कहानी
रसिया के उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में गाया जाने वाला एक लोकगीत है। होली के मौके पर इसे खासतौर से गाया जाता है।

ब्रज में होली पर जरूर गाते हैं रसिया (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की संस्कृति में रसिया अपनी एक खास जगह रखता है। इस लोकगीत के बिना ब्रज की होली अधूरी मानी जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई?
रसिया अपने खास बोल और धुन के लिए जाना जाता है, जिसमें प्रेम, मस्ती और भक्ति, तीनों का मेल होता है। आइए जानें क्या है रसिया लोकगीतों का इतिहास और ये क्यों इतने खास माने जाते हैं।
क्या है रसिया का इतिहास?
रसिया शब्द रस से बना है, जिसका मतलब आनंद या प्रेम से जुड़ा है। ब्रज क्षेत्र में भगवान कृष्ण को रसिया कहा जाता है, क्योंकि वे प्रेम और आनंद का स्वरूप माने जाते हैं। मध्यकाल में जब भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था, तब सूरदास जैसे संत-कवियों की रचनाओं ने रसिया लोकगीतों को जन्म दिया।
19वीं सदी के दौरान नौटंकी ने रसिया गीतों को नया मंच दिया और घर-घर में मशहूर कर दिया। समय के साथ ये ब्रज क्षेत्र की संस्कृति का हिस्सा बन गए और आम लोगों ने होली के समय चौपालों पर इन गीतों को गाना शुरू कर दिया।
रसिया क्यों गाया जाता है?
इन गीतों में मुख्य रूप से राधा-कृष्ण का जिक्र सुनने को मिलता है। उनके प्रेम, नोकझोंक, रासलीला और माखन चोरी की लीलाओं का बहुत खूबसूरत वर्णन इन गीतों में सुनाई देता है। ब्रज की होली रसिया लोकगीतों के बिना अधूरी मानी जाती है।
फाल्गुन महीने में ब्रजवासी ढोल और बंब की थाप पर रसिया जरूर गाते हैं और पूरा माहौल उत्साह और उमंग से भर जाता है।हालांकि, रसिया सिर्फ राधा-कृष्ण तक सीमित नहीं हैं। इनमें देवर-भाभी के रिश्ते, पति-पत्नी के प्रेम, सास-बहू के संबंध और बदले मौसमों का जिक्र भी मिलता है।
क्या है रसिया लोकगीतों की खासियत?
रसिया को खास इसकी भाषा बनाती है। इसे ब्रजभाषा में गाया जाता है, जो इन गीतों को मिठास से भर देते हैं। साथ ही, रसिया लोकगीतों की धुन काफी लयबद्ध होती है और इसे गाते समय बंब, ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम का इस्तेमाल किया जाता है।
इन लोकगीतों में बंब, जो बड़े नगाड़े जैसे होते हैं, की गूंज पूरे माहौल को ऊर्जा से भर देती है। रसिया की एक खास शैली है दंगल, जिसमें दो गायन मंडलियां आमने-सामने बैठती हैं और सवाल-जवाब के रूप में रसिया गाया जाता है। शृंगार, भक्ति और हास्य रस से भरे ये गीत उत्तर प्रदेश की संस्कृति का अहम हिस्सा हैं।
