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जिस गुजराती गीत पर गरबा करते नहीं थकते लोग, उसकी जड़ें बंगाल से! टैगोर की कविता से निकले हैं इसके बोल

Published: Sun, 18 Oct 2026 04:27 PM (IST)Updated: Mon, 19 Oct 2026 11:31 AM (IST)

गुजरात का मशहूर लोकगीत है 'मोर बनी थनगाट करे' रवींद्रनाथ टैगोर की कविता 'नबावर्षा' से प्रेरणा लेकर बनाया गया है।

'मोर बनी थनगाट करे' की जड़ें टैगोर की कविता से जुड़ी हैं (Image Source: AI Generated)

'मोर बनी थनगाट करे' की जड़ें टैगोर की कविता से जुड़ी हैं (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बॉलीवुड फिल्म 'गोलियों की रासलीला: राम-लीला' से लोगों के बीच पॉपुलर हुआ ‘मोर बनी थनगाट करे’ गाना वैसे तो गुजराती लोकगीत है, पर इसकी जड़ें पश्चिम बंगाल से जुड़ी हुई हैं। यह बात थोड़ी हैरान जरूर कर सकती है, लेकिन इसके पीछे एक दिलचस्प इतिहास है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। 

आइए आपको विस्तार से बताते हैं कि कैसे एक गुजराती लोकगीत का बंगाल से एक खास कनेक्शन है। 

पूर्व में बंगाल से पश्चिम में गुजरात कैसे पहुंचा एक लोकगीत? 

हम सभी जानते हैं कि गुजरात और बंगाल की संस्कृति एक दूसरे के विपरीत है, लेकिन इसके बावजूद ये दो छोर आपस में आकर मिले। दो संस्कृतियों की इस यात्रा में सहारा बना गुजरात का एक मशहूर लोकगीत ‘मोर बनी थनगाट करे’। यह गीत रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता ‘नबावर्षा' से लिया गया है। इसकी रचना टैगोर ने सन् 1900 में सिलाईदहा में प्रवास के दौरान की थी। 

इस कविता की बात करें तो इसमें मानसून की पहली बारिश और उससे प्रकृति में होने वाले बदलाव का जिक्र मिलता है। कविता का सबसे खूबसूरत भाव वो है जब बारिश की खुशी में कवि का मन बिल्कुल एक मोर की तरह नाचना शुरू कर देता है। 

गुजरात के स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार ने दी गुजराती जुबान 

गुजरात के महान साहित्यकार, कवि और स्वतंत्रता सेनानी झवेरचंद मेघाणी ने टैगोर की कविता को गुजराती भाषा में बदला। बता दें कि उन्हें गुजरात में राष्ट्रीय शायर का भी दर्जा मिला हुआ है। कहा जाता है कि साल 1920 में उन्होंने टैगोर के घर की यात्रा की थी, तब उन्होंने इस कविता को पहली बार सुना। मेघाणी इस कविता से इतने प्राभवित हुए कि इसकी पंक्तियां उनके मन में घर कर गईं। 

इसका नतीजा यह निकला कि मेघाणी ने साल 1944 में ‘नबावर्षा' से प्रेरणा लेकर एक नई रचना की, जिसका नाम 'मोर बनी थनगट करे' था। उन्होंने गुजराती में की गई इस नई रचना को अपने काव्य-संग्रह 'रवींद्र-वीणा' में स्थान दिया। इसके बाद गीत को आवाज देने और जन-जन तक पहुंचाने में प्रसिद्ध गुजराती लोक गायक हेमू गढ़वी का अहम योगदान रहा। 

भाव वही बस अंदाज गुजराती 

"मोर बनी थनगट करे" का मतलब है कि मोर जब खुश होता है, तो वह नृत्य करता है। यह भी टैगोर की कविता की तरह ही बारिश की खुशी में झूमने वाली भावना को दर्शाता है। इस लोकगीत पर गौर करने पर हम पाते हैं कि मेघाणी ने इस कविता का केवल गुजराती अनुवाद नहीं किया, बल्कि इसे चारण शैली में पेश करके पूरी तरह से  गुजराती लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया।