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‘ससुराल की चौखट से मायके को पुकार…’ बेटियों के अनकहे दर्द की कहानी सुनाता है देवभूमि का खुदेड़ लोकगीत

Published: Sun, 23 Aug 2026 03:01 PM (IST)

पहाड़ों में मायके के प्रेम और विरह की गाथा है खुदेड़ लोकगीत।

देवभूमि का खुदेड़ लोकगीत (Image Source: AI Generated)

देवभूमि का खुदेड़ लोकगीत (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। देवभूमि उत्तराखंड में ऊंचे और बर्फीले पहाड़ कितने शांत दिखाई देते हैं, पर इसी मौन में पहाड़ों की बेटियों का दर्द सुनाई देता है। वही दर्द जो संस्कृति में लिपटकर एक सुर बन गया और कहलाया खुदेड़ लोकगीत। 

हो सकता है आपने यह नाम पहली बार सुना हो लेकिन देवभूमि की हर एक नई नवेली ध्याणी (दुल्हन) खुदेड़ गीत में अपने मायके जाने का दर्द सुनाती है। आज हम इसी खुदेड़ लोकगीत पर बात करेंगे कि कैसे ब्याही गई बेटियों के सब्र का बांध टूटा और उनकी बेबसी इन गीतों में झलक आई। 

देवभूमि का खुदेड़ लोकगीत 

देवभूमि में विवाहित बेटियों द्वारा गाए जाने वाले खुदेड़ लोकगीत में खुदेड़ का मतलब है किसी का बिछड़ जाना या दूर चले जाना। जब बेटी की शादी होती है तो वह अपने मायके से अलग हो जाती है, और इसी पीहर के विरह की पीड़ा से खुदेड़ का जन्म होता है। इस लोकगीत में विरह के साथ प्रेम भी है, तड़प भी और अकेलापन भी क्योंकि वह स्त्री अपना दु:ख उस नए घर में किसी से साझा नहीं कर सकती। 

बताते चलें कि इस लोकगीत का संबंध उन बहुओं से भी है जिन्हें मायके बुलाने वाला कोई नहीं होता। फिर चाहे उसका परिवार न हो या परिस्थितियां जिम्मेदार हों। 

रोजमर्रा के काम निपटाते हुए गाती हैं महिलाएं 

मायके जाने का इंतजार कर रही ये महिलाएं दु:ख की घड़ी में किसी स्थान पर बैठकर विलाप नहीं करतीं। वो अपने रोजमर्रा के काम को करते हुए, कभी लकड़ी काटते हुए तो कभी खेतों में काम करते हुए अपनी सहेलियों के साथ इस गीत को गुनगुनाती हैं। 

प्रकृति बनती है संदेशवाहक 

नई ध्याणी अपना दु:ख किसी व्यक्ति से साझा न करके नदी, हवा, बादल, पेड़, पहाड़ और झरनों से कहती है। वह उन्हें अपना संदेशवाहक मानती है और उनसे मायके का बुलावा लाने का अनुरोध करती है। इसके बोल कुछ इस प्रकार हैं: 

ऊंची ऊंची डाड्यों तुम नीचि हवै जाओ,

घैणी कुलायो तुम छांटी जाओ।

मैंकु लागी च खुद मैतुड़ा की,

बाबा जी को देश देखण देवा ।।

इसमें नायिका पहाड़ों को झुकने के लिए कह रही है ताकि उस पार का नजारा वह साफ देख पाए। फिर वह घने जंगलों को छट जाने के लिए कहती है जिससे उसकी नजरों के सामने कोई बाधा न आए। फिर वह मैतुड़ा से मायके का जिक्र कर वहां की याद सताने के बारे में कहती है। 

कैसे गाए जाते हैं ये गीत? 

इन गीतों की लय गति मंद होती है और इनकी पदरचना बाजूबंद के रूप में होती है। बस इसमें एक अंतर यह है कि जहां एक तरफ बाजूबंद के गीत अपने प्रियजन से विरह की बात करते हैं तो वहीं खुदेड़ में मायके की याद शामिल है। अफसोस आज ये गीत डिजिटल दौर में कहीं खोते जा रहे हैं! 

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