'नचनिया डांस' से बिल्कुल अलग है बिहार का ये लोक नृत्य, पति-पत्नी का प्यार और व्यंग्य दिखाता है 'बक्खो-बक्खिन'
बक्खो-बक्खिन बिहार का खास लोक नृत्य है, जो पति-पत्नी से जुड़ा है। इसमें सामाजिक बुराइयों पर भी व्यंग्य कसा जाता है।

बिहार की संस्कृति को दिखाता है बक्खो-बक्खिन नृत्य (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार में सिर्फ नचनिया डांस नहीं होता। यहां कई लोक नृत्य भी किए जाते हैं, जो यहां की संस्कृति को जाहिर करते हैं। इन्हीं लोक नृत्यों में बक्खो-बक्खिन भी शामिल है।
बक्खो-बक्खिन पति-पत्नी से जुड़ा नृत्य है, जिसे जोड़े में किया जाता है। इस नृत्य के जरिए पति-पत्नी की नोकझोंक, प्रेम, रोजमर्रा की जिंदगी का संघर्ष और समाज की बुराइयों को दिखाया जाता है। आइए जानें बक्खो-बक्खिन नृत्य के बारे में।
क्या है बक्खो-बक्खिन नृत्य?
बक्खो-बक्खिन नृत्य बारिश के मौसम यानी सावन और भादो में खासकर किया जाता है। ये नृत्य बिहार के भोजपुरी, मैथिली और मगही क्षेत्र से खास नाता रखता है और वहां की ग्रामीण लोक-परंपरा से जुड़ा हुआ है। इस नृत्य में डांस के साथ-साथ नाटक भी किया जाता है और ये सदियों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक देखकर या सुनकर आगे बढ़ती आई है।
इस नृत्य को हमेशा पति-पत्नी के जोड़े के रूप में पेश किया जाता है, जिसमें उनके रिश्ते, रोजमर्रा की जिंदगी और सामाजिक मुद्दों को दिखाया जाता है।
क्यों किया जाता है बक्खो-बक्खिन?
बक्खो-बक्खिन नृत्य के जरिए पति-पत्नी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के खट्टे-मीठे अनुभवों, प्यार, नोक-झोंक और परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियों को दर्शाते हैं। इसके अलावा, इस नृत्य के जरिए समाज की बुराइयों और कुप्रथाओं पर व्यंग्य किया जाता है।
क्या है बक्खो-बक्खिन नृत्य की खासियत?
बक्खो-बक्खिन में शास्त्रीय नृत्य की तरह मुश्किल मुद्राएं आदि नहीं की जाती हैं। ये डांस बहुत की सिंपल स्टेप्स के साथ किया जाता है, जिसके साथ नाटक और डायलॉग्स को भी शामिल किया जाता है। ये नृत्य लोक धुनों पर किया जाता है। नर्तक और नर्तकियां साधारण ग्रामीण परिधान पहनते हैं, जो गांव की संस्कृति को दिखाता है। साथ ही, इस नृत्य की थीम भी कोई पौराणिक कथा या राजा-महाराजाओं से हटकर आम इंसान के जीवन से जुड़ी होती है।
कैसे किया जाता है बक्खो-बक्खिन नृत्य?
ये नृत्य हमेशा जोड़े में किया जाता है, जिसमें पति बक्खो की भूमिका निभाता है और पत्नी बक्खिन की भूमिका निभाते हैं। कुछ जगहों पर पुरुष ही स्त्री का रूप लेकर बक्खिन की भूमिका निभाते हैं और नृत्य करते हैं। नृत्य को पारंपरिक लोकगीतों और ढोल, मंजीरा जैसे वाद्य यंत्रों की धुन पर किया जाता है।
