'बकलोल दूल्हा' और धान कुटाई की रस्म से जुड़ा है ये भोजपुरी गीत, बिल्कुल ठेठ अंदाज में महिलाएं उड़ाती हैं मजाक
बिहार की शादियों में धान कुटाई की रस्म की जाती है। इस रस्म में दूल्हा ओखली में धान कूटता है और महिलाएं गीतों के जरिए उसका मजाक उड़ाती हैं।

धान कुटाई की रस्म में गाया जाने वाला गीत (AI Generated Image)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार की शादियों में धान कुटाई की रस्म होती है, जिसमें दूल्हे को ओखली में धान कूटना होता है। ये रस्म काफी खास होती है और इसे मजेदार बनाते हैं इस समय गाए जाने वाले लोकगीत। ऐसा ही धान कुटाई का एक गीत है हे राम दूल्हा बाबू...।
इस गीत को गाते हुए महिलाएं दूल्हे का मजाक उड़ाती हैं और उसकी धान कुटाई में कमियां गिनाती हैं। शारदा सिन्हा की आवाज से ये गीत मशहूर हुआ और आज बिहार की शादियों में जरूर गाया जाता है। आइए जानें महिलाएं क्या कहती हैं इस लोकगीत में।
दूल्हे की नादानी पर तंज
गीत की शुरुआती पंक्ति है कौन बकलोलबा ई बाटे दूल्हा बाबू, कौन मैया दीहली जनमिया रे बाबू? यानी दूल्हे को महिलाएं बकलोल कह रही हैं। बकलोल कोई गाली नहीं है, बल्कि बिहार में नासमझ को प्यार से बकलोल कह दिया जाता है। ये महिलाएं भी दुलार में दूल्हे को बकलोल कह रही हैं और पूछ रही हैं कि ये नादान दूल्हा किसका बेटा है?
महिलाएं आगे कहती हैं कि धनवा कुटेला न जाने रे, बकलोलवा कुटेला न जाने रे। धान कुटाई की रस्म में दूल्हे के धैर्य को परखा जाता है, जिसमें ओखली में धान कूटा जाता है। इस रस्म को मजेदार बनाने के लिए महिलाएं कह रही हैं कि दूल्हे को तो धान कूटना भी नहीं आता, बिल्कुल बकलोल यानी मूर्ख है।
ओखली का शानदार वर्णन
धान कुटाई की रस्म में ओखली और मूसल का खास महत्व होता है, क्योंकि इसी में धान कुटाई की जाती है। इस गीत में महिलाएं ओखली का वर्णन करते हुए कहती हैं चंदन के बनल सुंदर ओखरिया, बेलवा के बनल सुगर मुसरवा रे! यानी ओखली चंदन की लकड़ी से बना है और मूसल बेल के पेड़ की मजबूत लकड़ी से बना है।
इसके आगे कहती हैं धनवा कुटेला न जाने रे, बकलोलवा कुटेला न जाने रे। मतलब इतनी अच्छी सामग्री से ओखली और मूसल बना है, लेकिन इसका क्या फायदा? दूल्हे को तो धान कूटना आता ही नहीं है और उसकी नादानी का मजाक उड़ाते हुए फिर से दूल्हे को बकलोल कहा जाता है।
इस गीत का सांस्कृतिक महत्व
बिहार की शादियों में गाए जाने वाले गीतों में भावुकता के साथ व्यंग्य भी छिपा होता है। दूल्हा और उसके परिवार को इन गीतों के जरिए चिढ़ाया जाता है। ये गीत बिहार की लोक संस्कृति का अहम हिस्सा हैं और वर-वधू पक्ष के बीच की झिझक को दूर करने का काम करते हैं। धान कुटाई की रस्म का भी काफी महत्व है। ये रस्म बिहार की ग्रामीण संस्कृति की पहचान है।
