Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    न आग, न खेती... AI के जमाने में भी पाषाण काल की जिंदगी जी रहा है भारत का यह समुदाय

    Updated: Sun, 19 Jul 2026 12:00 PM (IST)

    पोर्ट ब्लेयर से 50 किमी दूर बसती है एक ऐसी दुनिया जहां के लोग नहीं जानते कि विकास क्या होता है! मिलिए दुनिया के आखिरी बचे आदिम समुदायों से। ...और पढ़ें

    अंडमान के द्वीप में पाषाण काल की जिंदगी (Image Source: AI Generated)

    अंडमान के द्वीप में पाषाण काल की जिंदगी (Image Source: AI Generated)

    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं, जहां एआई और रोबोट ने लोगों की जिंदगी आसान करते हुए उनका काम संभाल लिया है। पर इसी मॉडर्न जमाने में भारत के कुछ हिस्से ऐसे हैं, जो विकास की गति में सबसे पीछे खड़े हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं उन लोगों की, जो अभी भी स्टोन एज यानी पाषाण युग में जी रहे हैं? चलिए भारत के इस समुदाय की बात करते हैं। 

    अंडमान के द्वीप में पाषाण काल की जिंदगी 

    अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पोर्ट ब्लेयर से करीब 50 किलोमीटर दूर नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड नामक जगह पर सेंटिनल जनजाति के लोग रहते हैं। इन लोगों की जिंदगी आज भी पाषाण काल जैसी है और बाहरी दुनिया से इन्हें कोई लेना-देना नहीं है। जब भी कोई इस जनजाति से संपर्क करने की कोशिश करता है तो इनका रवैया भी आक्रामक हो जाता है। इस तरह सेंटिनल जनजाति ने कई बार यह साफ इशारा भी किया है कि उन्हें इस मॉडर्न दुनिया से कोई नाता नहीं रखना है। 

    तीन और जनजाति हैं शामिल 

    अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में अकेली सेंटिनल जनजाति नहीं है जो इस तरह अपना गुजर बसर कर रहे हैं। इसके अलावा, यहां ग्रेट अंडमानी, जारवा और ओंगे नाम की तीन और जनजाति हैं जिन्होंने प्रागैतिहासिक काल से ही अपने रहन-सहन को नहीं बदला है। जान लेने वाली बात यह है कि ये दुनिया के आखिरी बचे जनजाति समूहों में से एक हैं। 

    न खेती करते हैं और न ही पशुपालन 

    इस जनजाति की जीवनशैली इतनी अलग है कि ये लोग न तो खेती करते हैं और न पशुपालन। अब मन में सवाल आ रहा होगा कि फिर ये लोग जी कैसे रहे हैं तो बताते चलें कि यह जनजाति सुअर, फल, शहद, कंदमूल, कछुआ और मछली का सेवन करती है। इन्हें न तो आग जलानी आती है और न ही इस जनजाति के लोगों ने कभी नमक या चीनी का ही स्वाद चखा है। 

    खबरें और भी

    विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह

    सेंटिनल जनजाति में 50-100 लोगों की ही आबादी है। इसी वजह से भारत सरकार की तरफ से इस जनजाति को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह यानी PVTGs में शामिल किया गया है। पहली बार भारत सरकार की तरफ से साल 1991 में इन लोगों से संपर्क करने की कोशिश की गई थी, तब इन्होंने टीम से कुछ नारियल लिए थे। 

    यह भी पढ़ें- घूमर करते समय चेहरा क्यों ढकती हैं महिलाएं? दिलचस्प है इसकी कबीले से निकलकर राजघरानों तक पहुंचने की कहानी

    यह भी पढ़ें- खुद को 'सिकंदर द ग्रेट' का वंशज मानता है भारत का यह अनोखा गांव, टूरिस्ट्स को कुछ भी छूने की नहीं इजाजत