क्या 32 की उम्र तक 'बच्चा' रहता है हमारा दिमाग? कैंब्रिज स्टडी ने तोड़ा सबसे बड़ा भ्रम
कैंब्रिज विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन ने मानव मस्तिष्क के विकास के पांच मुख्य चरण और चार महत्वपूर्ण 'टर्निंग पॉइंट्स' बताए हैं। लगभग 4,000 ब्रेन स्कै ...और पढ़ें

दिमाग का विकास: नई स्टडी में सामने आया चौंकाने वाला सच
HighLights
कैंब्रिज अध्ययन ने मस्तिष्क विकास के 5 चरण बताए
मस्तिष्क में 9, 32, 66, 83 वर्ष पर बड़े बदलाव
32 वर्ष को महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट माना गया
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आपने हमेशा सुना होगा कि दिमाग का विकास बाल्यावस्था में ही हो जाता है। मगर यह पूरी जानकारी नहीं है। असल में यह प्रक्रिया तो लगातार चलती रहती है। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन के अनुसार, विज्ञानियों ने मानव मस्तिष्क के विकास के पांच मुख्य चरणों की पहचान की है।
यह अध्ययन लगभग 4,000 लोगों के ब्रेन स्कैन पर आधारित है और बताता है कि हमारा मस्तिष्क जीवन भर एक समान गति से नहीं, बल्कि चार प्रमुख ‘टर्निंग पाइंट्स’ के माध्यम से बदलता है।
जन्म से नौ वर्ष तक के चरण में ‘नेटवर्क कंसोलिडेशन’ होता है। एक बच्चे के मस्तिष्क में बहुत अधिक कनेक्शन होते हैं, जिन्हें धीरे-धीरे कम किया जाता है और केवल सक्रिय कनेक्शन ही बचते हैं।
नौ साल की उम्र तक मस्तिष्क की कार्यक्षमता में बड़ा बदलाव आता है और इसी समय मानसिक स्वास्थ्य विकारों का जोखिम भी बढ़ना शुरू होता है। हैरानी की बात यह है कि अध्ययन के अनुसार मस्तिष्क का ‘किशोरावस्था’ वाला विकास 32 साल की उम्र तक चलता है। इस दौरान मस्तिष्क के व्हाइट मैटर का विकास होता है, जिससे संचार नेटवर्क कुशल बनता है। 32 वर्ष की आयु को जीवनकाल का सबसे महत्वपूर्ण टर्निंग पाइंट माना गया है।
32 वर्ष से लेकर 66 वर्ष का समय मस्तिष्क के विकास का सबसे लंबा और स्थिर चरण है। इस दौरान मस्तिष्क की संरचना काफी हद तक स्थिर रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसी अवधि में इंसान की बुद्धिमत्ता और व्यक्तित्व में स्थिरता आती है।
66 वर्ष की आयु के आस-पास मस्तिष्क में फिर से बदलाव शुरू होते हैं। यह चरण धीरे-धीरे मस्तिष्क के नेटवर्क के पुनर्गठन और व्हाइट मैटर के क्षय से जुड़ा है, जिससे स्वास्थ्य समस्याओं (जैसे हाइ ब्लड प्रेशर) का मस्तिष्क पर प्रभाव बढ़ता जाता है, जो 83 वर्ष तक जारी रहता है।
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83 वर्ष की आयु के बाद मस्तिष्क अंतिम चरण में प्रवेश करता है। इसमें कनेक्टिविटी और कम हो जाती है व मस्तिष्क सूचनाओं के लिए कुछ विशिष्ट क्षेत्रों पर अधिक निर्भर रहने लगता है।