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    बच्चों के दिमाग के लिए 'जंक फूड' जैसी है Reels देखने की लत, फोकस और याददाश्त पर पड़ रहा बुरा असर

    Updated: Sat, 16 May 2026 09:29 AM (IST)

    शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और रील्स की लत बच्चों के दिमाग के लिए 'जंक फूड' जैसी है, जिससे उनके फोकस और याददाश्त पर बुरा असर पड़ रहा है। ...और पढ़ें

    रील्स देखने की लत से बच्चों के फोकस और याददाश्त पर बुरा असर (Image Source: AI-Generated)

    रील्स देखने की लत से बच्चों के फोकस और याददाश्त पर बुरा असर (Image Source: AI-Generated) 

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कोरोना महामारी के बाद से हमारे कंटेंट देखने के तरीके में बहुत बड़ा बदलाव आया है। आज इंटरनेट पर शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और रील्स का ही दबदबा है। लोग लगातार एक के बाद एक शॉर्ट वीडियो देखते रहते हैं और बिना थके स्क्रीन स्क्रॉल करते रहते हैं।

    इसका नतीजा यह हो रहा है कि हमारे दिमाग को बहुत छोटे-छोटे हिस्सों में जानकारी लेने की आदत पड़ रही है, जिससे हमें रुकने, सोचने और चीजों को गहराई से समझने का समय ही नहीं मिल रहा है। कैलाश दीपक अस्पताल के कंसल्टेंट और नियोनेटोलॉजिस्ट, डॉ. अविजीत प्रकाश यादव के अनुसार, इस आदत का सीधा असर हमारे फोकस, याददाश्त और उन कामों पर पड़ रहा है जिनमें धैर्य या लगातार सोचने की जरूरत होती है।

    Reels addiction in kids

    (Image Source: AI-Generated) 

    कैसे बच्चों के फोकस को खत्म कर रही हैं रील्स?

    वैसे तो यह समस्या हर उम्र के लोगों में देखी जा रही है, लेकिन बच्चों पर इसका सबसे ज्यादा खतरा है। आज के बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही स्क्रीन की दुनिया में बड़े हो रहे हैं। उनका दिमाग अभी विकास के चरण में है, खासकर वह हिस्सा जो एकाग्रता, भावनाओं को नियंत्रित करने और कुछ नया सीखने से जुड़ा है।

    जब बच्चे लगातार तेज गति वाला कंटेंट देखते हैं, तो स्क्रीन पर होने वाले हर स्वाइप के साथ उनके दिमाग को 'डोपामाइन' नाम के केमिकल का एक इंस्टेंट रिवॉर्ड मिलता है। यह केमिकल खुशी और आदत बनाने से जुड़ा है। धीरे-धीरे दिमाग को इस तेज उत्तेजना की तलब लगने लगती है। इसके कारण पढ़ाई करना, किताबें पढ़ना या सामान्य बातचीत जैसी रोजमर्रा की गतिविधियां उन्हें उबाऊ और कम दिलचस्प लगने लगती हैं।

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    दिमाग के लिए 'जंक फूड' साबित हो रहा शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट

    यही कारण है कि शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट की तुलना दिमाग के लिए 'जंक फूड' से की जाती है, और सच कहा जाए तो यह तुलना बिल्कुल सटीक है। यह उस पल में तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन ज्यादा मात्रा में इसका सेवन करने से दिमाग की धीमी और अधिक अर्थपूर्ण गतिविधियों को बर्दाश्त करने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो जाती है।

    शुरुआती संकेतों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

    माता-पिता को इसके शुरुआती चेतावनी संकेतों पर जरूर ध्यान देना चाहिए। यदि आपका बच्चा बिना फोन के बेचैन हो जाता है, होमवर्क करने के लिए एक जगह नहीं बैठ पाता, बार-बार चीजें भूलने लगता है, या बाहर खेलने और लोगों से मिलने-जुलने में उसकी दिलचस्पी खत्म हो गई है, तो यह अनहेल्दी स्क्रीन टाइम या इंटरनेट एडिक्शन का संकेत हो सकता है।

    गैजेट्स छीनने की जगह अपनाएं सही तालमेल

    इस समस्या का समाधान बच्चों पर पूरी तरह से स्क्रीन का बैन लगाना नहीं है, बल्कि एक सही संतुलन बनाना है। बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास और भावनात्मक भलाई के लिए यह बहुत जरूरी है कि वे कभी-कभी बोरियत भी महसूस करें। उन्हें किताबें पढ़ने, बाहर खुले में खेलने, नई हॉबीज अपनाने, पूरी नींद लेने और बिना किसी रुकावट के सोचने का पर्याप्त समय मिलना चाहिए, क्योंकि ये सभी अनुभव उनकी ओवरऑल ग्रोथ के लिए बेहद जरूरी हैं।

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