पार्किंसंस का 'अर्ली वॉर्निंग सिस्टम' है आपका पेट, लक्षण दिखने से पहले ही दे सकता है बीमारी का संकेत
एक नए अध्ययन से पता चला है कि पेट में मौजूद सूक्ष्मजीव पार्किंसंस रोग के खतरे की भविष्यवाणी कर सकते हैं। ...और पढ़ें

क्या आपकी आंतों में छिपा है पार्किंसंस बीमारी का संकेत? (Image Source: AI-Generated)

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प्रेट्र, नई दिल्ली। क्या आप जानते हैं कि हमारे पेट में मौजूद सूक्ष्मजीव हमें एक गंभीर न्यूरोडीजेनरेटिव बीमारी- पार्किंसंस के खतरे के बारे में पहले से आगाह कर सकते हैं?
जी हां, एक नए अध्ययन से यह चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है कि गट माइक्रोबायोम में होने वाले बदलावों से पार्किंसंस रोग के जोखिम की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है।
बीमारी और 'जीबीए 1' जीन का कनेक्शन
पार्किंसंस रोग के पीछे के जेनेटिक कारणों की बात करें, तो जीबीए 1 वेरिएंट इस बीमारी के लिए सबसे आम जोखिम कारक माना जाता है। जिन लोगों में यह वेरिएंट पाया जाता है, उनमें पार्किंसंस होने का खतरा सामान्य से 30 गुना तक अधिक बढ़ जाता है।

(Image Source: AI-Generated)
अध्ययन के अनुसार, जिन व्यक्तियों में जीबीए 1 जीन मौजूद होता है, उनकी आंतों के लगभग एक-चौथाई सूक्ष्मजीवों की संरचना में होने वाला बदलाव इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उनमें यह न्यूरोडीजेनरेटिव बीमारी विकसित होने की आशंका बहुत अधिक है।
कहां से आया यह महत्वपूर्ण शोध?
यह अहम और विस्तृत शोध विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर मेडिसिन' में प्रकाशित किया गया है। इस शोध के जरिए यह बताया गया है कि पेट के माइक्रोबायोम में होने वाले इस तरह के बदलाव सीधे तौर पर पार्किंसंस रोग के बढ़ते खतरे से जुड़े हुए हैं।
कैसे हुआ आंकड़ों का विश्लेषण?
वैज्ञानिकों की टीम ने इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए ब्रिटेन और इटली के प्रतिभागियों से प्राप्त क्लीनिकल और मल संबंधी डेटा का गहराई से विश्लेषण किया। इस अध्ययन में मुख्य रूप से इन लोगों को शामिल किया गया था:
खबरें और भी
- पार्किंसंस रोग से पीड़ित 271 लोग।
- जीबीए 1 वेरिएंट वाले 43 ऐसे लोग, जिनमें बीमारी का कोई भी नैदानिक लक्षण अभी तक नहीं दिखा था।
हैरान करने वाले नतीजे
जब स्वस्थ लोगों और इस न्यूरोडीजेनरेटिव स्थिति से पीड़ित मरीजों के डेटा की तुलना की गई, तो एक बड़ा अंतर देखने को मिला:
- दोनों समूहों के बीच सूक्ष्मजीवों की कुल 176 प्रजातियों में साफ अंतर पाया गया।
- विश्लेषण में यह बात भी सामने आई कि स्वस्थ और बीमार समूहों के बीच गट माइक्रोबायोम के एक-चौथाई से भी अधिक भाग की मात्रा पूरी तरह से बदल गई थी।
लक्षण दिखने से पहले ही चल सकेगा पता
इस पूरी रिसर्च का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि पार्किंसंस बीमारी से जुड़े ये जैविक बदलाव, मरीज में बीमारी के बाहरी लक्षण दिखने से बहुत पहले ही शुरू हो जाते हैं। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि इस नई खोज की मदद से रोग के विकास के बिल्कुल शुरुआती चरणों में ही बीमारी की पहचान की जा सकेगी, जिससे समय रहते बचाव और इलाज के कदम उठाए जा सकेंगे।