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    क्या बहू-बेटी की तुलना में पार्टनर की देखभाल से जल्दी ठीक होते हैं स्ट्रोक के मरीज?

    Updated: Wed, 01 Apr 2026 12:05 PM (IST)

    क्या स्ट्रोक के बाद मरीज रिकवरी इस बात पर निर्भर करती है कि उनकी शादी किससे हुई है? आइए जानते हैं। ...और पढ़ें

    क्या जीवनसाथी की देखभाल से स्ट्रोक के मरीज जल्दी ठीक होते हैं? (Image Source: AI-Generated)

    क्या जीवनसाथी की देखभाल से स्ट्रोक के मरीज जल्दी ठीक होते हैं? (Image Source: AI-Generated) 

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हाल ही में 'जर्नल ऑफ स्ट्रोक एंड सेरेब्रोवास्कुलर डिजीज' में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ है। इस रिपोर्ट के अनुसार, जिन मरीजों की देखभाल उनके पार्टनर (पति या पत्नी) ने की, उनमें बेटियों या बहुओं द्वारा देखभाल किए गए मरीजों की तुलना में 44% ज्यादा और बेहतर रिकवरी देखी गई।

    पहली नजर में ऐसा लगता है कि जीवनसाथी बेहतर देखभाल करने वाले होते हैं, लेकिन अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार का कहना है कि यह निष्कर्ष पूरी तरह सही नहीं है। आइए, डिटेल में समझते हैं इस बारे में।

    Stroke recovery

    (Image Source: AI-Generated) 

    क्या देखभाल में वाकई फर्क होता है?

    असल बात यह है कि जिन मरीजों की देखभाल उनके जीवनसाथी करते हैं, वे अक्सर उम्र में अपेक्षाकृत छोटे होते हैं और शारीरिक रूप से कम कमजोर होते हैं। इसके अलावा, वे एक साथ रहते हैं और यह भी संभव है कि उन्हें आया स्ट्रोक कम गंभीर रहा हो। इसलिए, इसे डॉकटर के मुताबिक "जीवनसाथी बनाम बेटी या बहू" के मुकाबले के रूप में देखना गलत होगा।

    क्या है इस रिसर्च की असली सच्चाई?

    सच्चाई यह है कि स्ट्रोक से मरीज का ठीक होना इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें लगातार और भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई देखभाल मिल रही है या नहीं, न कि टुकड़ों में की गई देखभाल। स्ट्रोक से रिकवरी केवल उस एक घंटे के दौरान नहीं होती जब मरीज फिजियोथेरेपी ले रहा होता है, बल्कि दिन के बाकी 23 घंटों में भी होती है।

    Patient recovery science

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    (Image Source: AI-Generated)

    मरीज के लिए अपनों का साथ सबसे जरूरी

    परिवार का सपोर्ट मरीज को चलने-फिरने के लिए प्रोत्साहित करने, एक्सरसाइज में मदद करने, समय पर दवाइयां देने और अन्य जटिलताओं को रोकने में बहुत महत्वपूर्ण होता है। जीवनसाथी अक्सर मरीज को यह निरंतरता दे पाते हैं। अगर दूसरे सदस्य (जैसे बेटियां या बहुएं) ऐसा नहीं कर पाते, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वे परवाह नहीं करते। दरअसल, उनके जीवन का ढांचा या जिम्मेदारियां उन्हें हमेशा साथ रहने की अनुमति नहीं देतीं।

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    इसके अलावा, खासतौर से भारत में इसका एक सांस्कृतिक पहलू भी है। देखभाल करने की जिम्मेदारी केवल अच्छे इरादे से तय नहीं होती, बल्कि यह परिवार की गतिशीलता, स्वतंत्रता और मरीज के आस-पास रहने की स्थिति पर भी निर्भर करती है।

    इन सबके बीच हम अक्सर एक कड़वी सच्चाई को नजरअंदाज कर देते हैं। लगातार देखभाल करने वाले जीवनसाथी को भी इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। वे अक्सर मानसिक थकान, अत्यधिक तनाव और डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं।

    इस अध्ययन की सबसे बड़ी सीख यह नहीं है कि देखभाल करने वाला व्यक्ति कौन है। असली सीख यह है कि स्ट्रोक से मरीज तब सबसे जल्दी और बेहतर तरीके से उबरता है, जब उसकी देखभाल निरंतर, बेहतर तालमेल के साथ और पूरी लगन से की जाए।

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