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फिट दिखने का मतलब पूरी तरह हेल्दी होना नहीं! युवाओं को खामोशी से शिकार बना रहा फैटी लिवर, डॉक्टर दे रहे चेतावनी

Published: Tue, 08 Sep 2026 03:20 PM (IST)

मोटापा, डायबिटीज और खराब खानपान हर तीसरे भारतीय युवा को अब फैटी लिवर की समस्या दे रहा है। शुरुआत में ...और पढ़ें

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आप युवा हैं और मोटापे जैसी समस्याओं से बचे हुए हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पूरी तरह स्वस्थ हैं। आज के समय में फैटी लिवर और प्रीडायबिटीज बेहद शांत तरीके से शरीर में बीमारी की नींव तैयार कर देते हैं। लंबे समय तक लोग इससे बेखबर बने रहते हैं, क्योंकि इनके लक्षण स्पष्ट नहीं होते। 

रूटीन जांच या समस्या बढ़ने पर ही लोग निदान का रास्ता चुनते हैं। डायबिटीज, असामान्य कोलेस्ट्राल, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारी आज किसी खास आयु वर्ग की समस्या नहीं है, युवा, यहां तक कि बच्चे भी इनकी चपेट में आ रहे हैं। 

रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट/अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, शुगर वाले ड्रिंक्स, सुस्त जीवनशैली, इंसुलिन रेजिस्टेंस बेशुमार बीमारियों की जड़ बन रहे हैं।  एम्स के एक हालिया अध्ययन के अनुसार भारत में 38.6 प्रतिशत वयस्क और 35.4 प्रतिशत बच्चे फैटी लिवर से प्रभावित हो चुके हैं। 

सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलाजी के को-चैयरमैन डॉ. पीयूष रंजन बताते हैं कि चूंकि अब बच्चों में भी मोटापे बढ़ रहा है, इसलिए स्वास्थ्य समस्या होने पर उनका लिवर फंक्शन टेस्ट (एलएफटी) भी कराना चाहिए। फैटी लिवर के लिए दवाएं तो हैं, पर बचाव उससे अधिक महत्वपूर्ण है। अगर किसी तरह का रिस्क फैक्टर है, तो बेहतर होगा कि लिवर को लेकर सतर्कता बढ़ा दें।

खराब जीवनशैली दे रही है लिवर की बीमारी 

मोटापे की समस्या शहरी और ग्रामीण दोनों ही इलाकों में बढ़ रही है। इससे एमएसएलडी यानी मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज का जोखिम भी बढ़ा है। यह दुनियाभर में लिवर की सबसे आम बीमारी है। 

इसे पहले नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) कहा जाता था। दरअसल, यह लिवर की ऐसी बीमारी है, जो अधिक वजन, टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी सेहत समस्या वालों को अधिक प्रभावित करती है।

समझें एमएएसएलडी को 

आसान शब्दों में कहें तो यह लिवर में बहुत अधिक फैट जमा होने की स्थिति है। हर व्यक्ति में गंभीरता अलग-अलग हो सकती है, हेपेटिक स्टीटोसिस से लेकर बीमारी के अधिक गंभीर रूप मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोहेपेटाइटिस (मैश) तक। 

मैश के कारण लिवर में सूजन आ जाती है या आकार बढ़ जाता है। इससे लिवर को नुकसान पहुंचता है। गंभीरता बढ़ने पर सिरोसिस या लिवर कैंसर जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

युवा भारतीयों में फैटी लिवर होने के कारण

  • सुस्त जीवनशैली- देश के बड़ी युवा आबादी अब शारीरिक तौर पर अपनी सक्रियता बहुत कम कर चुकी है। लोग नियमित शारीरिक व्यायाम, बाहरी गतिविधियों में कमी से दूर होने लगे हैं। लंबे समय तक बैठे रहना (काम/पढ़ाई/स्क्रीन के सामने) की आदत बनती जा रही है। जीवनशैली में शिथिलता आने के चलते मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, जिससे जिससे लिवर और अन्य अंगों में फैट जमा होने लगता है।
  • मोटापा और वजन बढ़ना- पेट के आसपास जमा फैट और वजन बढ़ने की समस्या सीधे तौर पर फैटी लिवर से जुड़ी हुई है। अतिरिक्त फैट मेटाबालिक असंतुलन का कारण बनता है। यह स्थिति अब किशोरों और युवाओं में भी देखी जा रही है।
  • आहार की समस्या- आधुनिक खानपान की आदतें, जैसे जंक फूड और फास्ट फूड, सॉफ्ट ड्रिंक्स, पैक्ड जूस, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट का बार-बार सेवन और भोजन में फाइबर और पोषक तत्वों की कमी के चलते लिवर में फैट जमा होने लगता है और मेटाबॉलिक संतुलन बिगड़ता है।
  • टाइप-2 डायबिटीज- इंसुलिन रेजिस्टेंस फैटी लिवर का एक मुख्य कारण है। इसमें कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रिया कम कर देती हैं। इससे ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है, जो लिवर में फैट जमा होने की स्थिति पैदा करता है। युवाओं में इसका संबंध प्री-डायबिटीज और टाइप-2 डायबिटीज से भी होता है।
  • तनाव और खराब नींद- तनाव और नींद का अनियमित पैटर्न भी फैटी लिवर की समस्या बढ़ाता है। कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के बढ़ने से मेटाबालिज्म बाधित होता है। वहीं नींद के खराब होने के चलते फैट का रेगुलेशन भी अनियमित होता है।
  • जेनेटिक्स और फैमिली हिस्ट्री- कुछ लोगों में आनुवंशिक रूप से यह समस्या होने का जोखिम रहता है। कुछ परिवारों में डायबिटीज या फैटी लिवर की समस्या देखी जाती है।

फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण

शुरुआती चरण में लक्षण नहीं होने या हल्के होने के कारण फैटी लिवर को "साइलेंट डिजीज" या खामोश बीमारी कहा जाता है। हालांकि कुछ लक्षण होने पर लिवर की जांच करानी चाहिए-

  • लगातार थकान महसूस होना
  • पेट में खासकर दाईं ओर खिंचाव महसूस होना
  • भोजन के बाद पेट फूलना या भारी महसूस होना
  • आलस्य आना या ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई

समझें फैटी लिवर की गंभीरता

अगर सही समय पर उचित इलाज न किया जाए, तो यह अनेक गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है:

  • लिवर में सूजन
  • फाइब्रोसिस
  • सिरोसिस
  • लिवर फेल होने का खतरा

किन लोगों को है अधिक जोखिम

  • जिन लोगों का वजन बहुत अधिक है
  • जिन्हें टाइप 2 डायबिटीज या प्री-डायबिटीज है
  • हाई कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड्स है
  • बैठकर काम करने या सुस्त जीवनशैली है
  • अधिक जंक फूड या मीठा खाने की आदत है

फैटी लिवर का कैसे लगता है पता

  • लिवर फंक्शन टेस्ट (एलएफटी)- लिवर की सेहत जांच
  • ब्लड टेस्ट- शुगर और लिपिड स्तर की जांच
  • पेट का अल्ट्रासाउंड- स्क्रीनिंग टूल
  • एडवांस्ड इमेजिंग (जरूरत पड़ने पर)- गंभीरता का पता लगाने के लिए

जीवनशैली में सुधार ही है मुख्य इलाज

  • वजन कम करने से लिवर का फैट कम होता है।
  • स्वस्थ भोजन और व्यायाम शरीर की कार्यप्रणाली को सही रखता है
  • नियमित स्वास्थ्य जांच बीमारी को पकड़ने और इलाज में मददगार है

युवाओं के लिए बचाव के टिप्स

  • स्वस्थ आहार की आदत डालें, भोजन में फल, सब्जियां और फाइबर शामिल करें। हेल्दी फैट (नट्स, बीज, मछली) सेहत के लिए लाभकारी है।
  • चीनी, रिफाइंड कार्ब्स, जंक और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से बचें।
  • सप्ताह में 150 मिनट व्यायाम करें, पैदल चलें, साइकिल चलाएं या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें। लंबे समय तक बैठे रहने से बचें।
  • वजन को नियंत्रित रखें। पेट की चर्बी कम करने पर ध्यान दें। रोज सात से आठ घंटे की अच्छी नींद लें और तनाव पर काबू रखने के लिए योग या ध्यान करें।

डॉक्टर से कब मिलें

  • लगातार थकान महसूस होने पर
  • लिवर फंक्शन की रिपोर्ट असामान्य होने पर
  • मोटापा और मेटाबॉलिक रिस्क फैक्टर होने पर
  • लिवर या डायबिटीज की फैमिली हिस्ट्री होने पर
  • शुरुआती मेडिकल सलाह बीमारी को बढ़ने से बचा सकती है।

जीवनशैली का बिगड़ा रूप है फैटी लिवर


कम उम्र में फैटी लिवर होने के पीछे दो ही मुख्य कारण हैं- मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता। वैसे तो फैटी लिवर की गंभीरता बढ़ाने में डायबिटीज, थायरॉइड, कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं भी जिम्मेदार होती हैं। बच्चों में मोटापा 20 प्रतिशत तक हो चुका है। यही अनेक स्वास्थ्य समस्याओं की जड़ है। बच्चे उच्च कैलोरी वाले और पैकेज्ड फूड पर निर्भर होते जा रहे हैं। उनका बाहर निकलकर व्यायाम-कसरत करना कम हो गया है। यही आदत कम उम्र में ही लिवर और डायबिटीज जैसी मुसीबतें दे रही है। चूंकि फैटी लिवर के शुरुआती स्पष्ट लक्षण नहीं होते और दिनचर्या में कोई अधिक समस्या नहीं होती, इसलिए समय पर उपचार नहीं हो पाता। समस्या बढ़ने पर पेट के दाहिने तरफ ऊपरी हिस्से में खिंचाव जैसा महसूस हो सकता है। लिवर की सेहत जांचने के लिए अल्ट्रासाउंड या एलएफटी आवश्यक है। अगर किसी तरह के रिस्क फैक्टर हैं तो एलएफटी कराना आवश्यक है। फैटी लिवर से बचने के लिए भोजन में प्रोटीन, फल, सलाद को बढ़ाएं है और सैचुरेट फैट व कैलोरी कम रखें। बच्चों की फोन या टैबलेट पर निर्भरता कम करें। कुछ लोग मोटापे के शिकार हैं और एल्कोहल भी लेते हैं, ऐसे लोगों को अधिक जोखिम हो सकता है। इसलिए जरूरी है, जीवनशैली से सुधार और स्वस्थ आदतों का विकास करने का प्रयास करें।

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डॉ. पीयूष रंजन, को-चेयरमैन, गैस्ट्रोएंटेरोलाजिस्ट, सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली