बिना वजह महसूस करते हैं तनाव? कहीं आप 'सेकंड हैंड स्ट्रेस' के शिकार तो नहीं, जानें बचाव के तरीके
अगर आप किसी दूसरे का तनाव कम करना चाहते हैं तो पहले खुद को तनावमुक्त और सकारात्मक रखना जरूरी है। ...और पढ़ें

क्या होता है सेकंड हैंड स्ट्रेस? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सेकंड हैंड स्ट्रेस वायरल संक्रमण की तरह होता है, जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तेजी से फैलता है। अगर आपके आसपास का माहौल तनावपूर्ण है या आपका सहकर्मी लगातार चिंतित रहता है, तो इसका असर आप पर पड़ना स्वाभाविक है।
कई बार ऐसा होता है कि आप अपने तनाव की वजह नहीं समझ पाते, या बिना किसी स्पष्ट कारण के परेशान रहने लगते हैं। यही सेकेंड हैंड स्ट्रेस के लक्षण, हैं, जो धीरे-धीरे आपको अवसाद की ओर धकेल सकते हैं। मेंटल हेल्थ फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार कुछ लोगों में प्राइमरी स्ट्रेस की तुलना में सेकेंड हैंड स्ट्रेस अधिक देखा गया है।
दूसरों के तनाव से तनावग्रस्त
कई बार हम दूसरों की परेशानियों से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि खुद ही तनाव का शिकार बन जाते हैं। उनका नकारात्मक सोच हम पर इस तरह से हावी हो जाती है कि हमारे सोचने-समझने की क्षमता कम होने लगती है। ऐसे में न तो हम उनकी मदद कर पाते हैं और न ही अपनी। परिणामस्वरूप, हम खुद भी उसी नकारात्मक चक्र में फंस जाते हैं। आइए जानें इससे बचने के तरीके-
- भावनात्मक दूरी बनाएं- जब भी आपको लगे कि आप सेकेंड हैं़ स्ट्रेस से प्रभावित हो रहे हैं, तो उस स्थिति से थोड़ी दूरी बनाना जरूरी है। किसी की समस्या में तब तक गहराई से न उलझें, जब तक वह आपसे मदद न मांगे। हर समय दूसरों की चिंता में डूबे रहने से आप किसी की मदद नहीं कर पाएंगे, बल्कि खुद भी तनाव में फंसते चले जाएंगे।
- स्वयं की करें देखभाल- तनावग्रस्त व्यक्ति की मदद करने के लिए स्वयं को मानसिक रूप से मजबूत रखना जरूरी है। इसलिए रोजाना गहरी सांसों का अभ्यास करना चाहिए। मानसिक स्थिति मजबूत करने के लिए योग-ध्यान करें। प्रकृति के साथ वक्त बिताने से भी आप सकारात्मक बने रहेंगे।
- नियंत्रित चीजों को करें स्वीकार- आप चाहे जितनी कोशिश करें, कुछ चीजें आपके नियंत्रण में नहीं होतीं। इसलिए खुद को बार-बार याद दिलाएं कि दूसरे व्यक्ति की भावनाएं, प्रतिक्रियाएं और फैसले आपके हाथ में नहीं हैं। आप केवल अपनी भावनाओं और प्रतिक्रियाओं के लिए जिम्मेदार हैं।
तनाव में फर्क नहीं कर पाता दिमाग
डॉ. ओमप्रकाश (प्रमुख, मनोरोग विभाग इहबास, नई दिल्ली) बताते हैं कि आजकल तनाव सिर्फ अपनी समस्याओं तक सीमित नहीं रहा. दूसरों की परेशानियों में खुद को दुखी करना भी तनाव लेना है। ऐसे स्ट्रेस को 'विकारियस' कहते हैं, जिसमें दिमाग कई बार सीधे और परोक्ष तनाव में फर्क नहीं कर पाता। इंटरनेट मीडिया के दौर में बिना किसी व्यक्तिगत घटना के भी तनाव महसूस होने लगता है। ऐसे में नकारात्मक खबरों से दूरी बनाएं डिजिटल डिटॉक्स करें। दूसरों की मदद में मानसिक सीमाएं तय करें।