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    भाषा व संस्कृति को बचाना समय की मांग: कोल्हान विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में बोले अर्थशास्‍त्री डॉ. ज्यांद्रेज

    Updated: Sat, 08 Aug 2026 09:21 PM (IST)

    कोल्हान विश्वविद्यालय में विश्व आदिवासी दिवस समारोह में डॉ. ज्यां द्रेज ने युवाओं से अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का आह्वान किया। कार ...और पढ़ें

    विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में कोल्हान विवि के शहीद पोटो हो सभागार में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेते अर्थशास्त्री डाॅ. ज्यां द्रेज व अन्‍य।

    विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में कोल्हान विवि के शहीद पोटो हो सभागार में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेते अर्थशास्त्री डाॅ. ज्यां द्रेज व अन्‍य।

    HighLights

    1. पद्मश्री डॉ. जानुम सिंह सोय ने सांस्कृतिक पहचान संजोने का संदेश दिया।

    2. चित्रकला प्रदर्शनी और 'सुकुन बुरु' रही कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण।

    जागरण संवाददाता, चाईबासा। विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में शनिवार को कोल्हान विश्वविद्यालय (KU) के शहीद पोटो हो सभागार में एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया। 
     
    विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र, इतिहास, भूगर्भ एवं भूगोल विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. (डॉ.) अंजिला गुप्ता ने की।
     

    वरिष्ठ विभूतियों की उपस्थिति

    समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री डॉ. जानुम सिंह सोय, सम्मानित अतिथि के रूप में प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं सामाजिक चिंतक डॉ. ज्यां द्रेज, तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भोगला सोरेन एवं अनुपम पूर्ति उपस्थित रहे। 
     
    कार्यक्रम में कुलसचिव डॉ. अमर कुमार, शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और समाज के विभिन्न गणमान्य लोग भी शामिल हुए। मुख्य अतिथि अर्थशास्‍त्री डॉ. ज्यां द्रेज ने युवाओं से अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने की अपील की। 
     
    डॉ.जानुम सिंह सोय ने पारंपरिक हो गीत के माध्यम से सांस्कृतिक पहचान को संजोने का संदेश दिया। अर्थशास्त्री डॉ. ज्यां द्रेज ने कहा कि आदिवासी समाज की साझी संस्कृति, सामुदायिक जीवन और सामूहिक मूल्य आज पूरे समाज के लिए प्रेरणादायक हैं। 


    उन्होंने समाज से ऊंच-नीच और अनावश्यक पदानुक्रम को दूर रखने पर बल दिया। वहीं, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता भोगला सोरेन ने वैश्वीकरण के इस दौर में आदिवासी भाषा और संस्कृति पर पड़ रहे प्रभावों पर चिंता व्यक्त की और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर जोर दिया।

    चित्रकला प्रदर्शनी और सुकुन बुरु रही आकर्षण का केंद्र

    समारोह के दौरान लगाई गई चित्रकला एवं आदिवासी कला-संस्कृति प्रदर्शनी ने लोगों को खासा आकर्षित किया। आर्ट गैलरी में अनुपम पूर्ति, डॉ. अभिजीत मुंडा, हरे कृष्णा एवं रवि मुंडू की कलाकृतियों के माध्यम से आदिवासी जीवन और प्रकृति के संबंधों को उकेरा गया। 
     
    अनुपम पूर्ति की विशेष 'सुकुन बुरु' प्रस्तुति ने आदिवासी जनजीवन और प्रकृति के अटूट जुड़ाव को जीवंत किया। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. मीनाक्षी मुंडा और डॉ. अरविंद कुमार ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन रिंकी दोराई द्वारा प्रस्तुत किया गया।