रांची में गहराता जल संकट: बढ़ती आबादी से पेयजल व्यवस्था से चरमराई व्यवस्था, 600 से अधिक तालाब गायब
रांची में बढ़ती आबादी के बावजूद पेयजल व्यवस्था चरमराई हुई है। पर्याप्त उत्पादन के बावजूद वितरण प्रणाली की खामियों, चोरी और लीकेज के कारण आधी आबादी शुद ...और पढ़ें
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रांची में आधी आबादी अब भी बूंद-बूंद को मोहताज (AI Generated Image)
HighLights
उत्पादन पर्याप्त, फिर भी आधी रांची पानी से वंचित।
भूजल स्तर गिर रहा, 600 से अधिक तालाब गायब।
वितरण खामियां, चोरी और लीकेज मुख्य कारण।
जागरण संवाददाता, रांची। राजधानी रांची में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके अनुरूप पेयजल व्यवस्था मजबूत नहीं हो पाई है। हालात यह हैं कि शहर में पानी की उपलब्धता उत्पादन के स्तर पर पर्याप्त होने के बावजूद वितरण व्यवस्था की खामियों के कारण आधी आबादी आज भी शुद्ध पेयजल से वंचित है।
रांची में जल संकट उत्पादन की कमी से ज्यादा वितरण, प्रबंधन और संरक्षण की विफलता का परिणाम है। यदि समय रहते पाइपलाइन सुधार, जल संरक्षण और नए स्रोतों पर ध्यान नहीं दिया कगया, तो भविष्य में हालात और भयावह हो सकते हैं।
53 वार्डों के 45 प्रतिशत घरों तक ही पहुंचता है पानी
रांची शहर में जलापूर्ति के लिए गेतलसूद (रूक्का), कांके (गोंदा) और हटिया डैम प्रमुख स्रोत हैं। इनमें सबसे बड़ा रूक्का डैम है, जिससे आधे से अधिक शहर को पानी की आपूर्ति होती है। इसके बावजूद नगर निगम क्षेत्र के 53 वार्डों में केवल करीब 45 प्रतिशत घरों तक ही नियमित नल जल पहुंच पा रहा है।
रांची में कुल 2.10 लाख घर हैं, लेकिन अब तक करीब 68 हजार घरों में ही वैध वाटर कनेक्शन दिया जा सका है। हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में लोग आज भी चापाकल, कुएं, नदी-नालों और अन्य प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर हैं। जबकि जिम्मेदार विभाग दावा करता है कि शहर के 80 प्रतिशत घरों तक पाइपलाइन से पानी पहुंच रहा है।
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उत्पादन ज्यादा, फिर भी प्यासे लोग
रांची में तीनों जलशोधन संयंत्रों से प्रतिदिन करीब 20.43 करोड़ लीटर पानी की आपूर्ति हो रही है, जबकि शहर की जरूरत 16.20 करोड़ लीटर है। यानी उत्पादन के स्तर पर करीब 4.23 करोड़ लीटर पानी अधिक उपलब्ध है।
इसके बावजूद शहर में रोजाना लगभग चार करोड़ लीटर पानी की चोरी और बड़े पैमाने पर पाइपलाइन लीकेज से जल की बर्बादी हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार यह पानी करीब पांच लाख लोगों की जरूरत पूरी कर सकता है।
- रूक्का प्लांट : 14.52 करोड़ लीटर
- कांके प्लांट : 1.81 करोड़ लीटर
- हटिया प्लांट : 4.08 करोड़ लीटर
55% आबादी अब भी वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर
2011 की जनगणना के अनुसार रांची जिले की आबादी 29.14 लाख थी, जिसमें शहरी क्षेत्र की आबादी 11.37 लाख थी। वर्ष 2024 में शहरी आबादी बढ़कर करीब 15.84 लाख हो चुकी है। इसके बावजूद जलापूर्ति व्यवस्था में अपेक्षित विस्तार नहीं हुआ। आज भी शहर की करीब 55 प्रतिशत आबादी को शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है। 20 हजार से अधिक ऐसे कनेक्शन हैं, जिनमें पाइप तो लगे हैं, लेकिन पानी नहीं आता।
भूजल संकट गहराया, कई इलाके ड्राई जोन
रांची में भूगर्भ जल स्तर लगातार गिर रहा है। कांके क्षेत्र को ओवर-एक्सप्लॉयटेड घोषित किया जा चुका है, जबकि ओरमांझी और रातू सेमी-क्रिटिकल जोन में हैं। शहर के कई इलाकों में 1000 फीट तक बोरिंग कराने के बावजूद पानी नहीं मिल रहा है। कांके, डोरंडा, कोकर, तुपुदाना, हिनू, एयरपोर्ट, सुकुरहुटू, पुनदाग जैसे क्षेत्रों में बोरवेल सूख चुके हैं। यह संकेत है कि शहर तेजी से जल संकट की ओर बढ़ रहा है।
गायब हो गए 600 से ज्यादा तालाब
एक समय रांची को तालाबों का शहर कहा जाता था। 1928 में यहां करीब 900 तालाब थे, जिनमें से 270 शहरी क्षेत्र में थे। अब जिले में मात्र 280 तालाब बचे हैं और शहरी क्षेत्र में यह संख्या घटकर 42 रह गई है। तालाबों के अतिक्रमण और उपेक्षा के कारण जल संरक्षण की परंपरागत व्यवस्था लगभग खत्म हो चुकी है।
एक्सआईएसएस रांची की जीआईएस टीम के अध्ययन में सामने आया है कि 2018 की तुलना में 2025 तक शहर के कई जलाशय और आर्द्रभूमि सिमट गए या खत्म हो गए। इससे जल संरक्षण की क्षमता घटी है और संकट और गहराने की आशंका बढ़ गई है।
बोर्ड की रिपोर्ट चिंताजनक
सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की जनवरी 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में भूजल निकासी 2020 के 29.13 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 31.42 प्रतिशत हो गई है। राज्य को 263 यूनिट में बांटकर किए गए आकलन में बेरमो, बलियापुर, गोलमुरी-जुगसलाई, जमशेदपुर शहरी और चितरपुर में सबसे अधिक दोहन दर्ज किया गया, जबकि तोपचांची, धनबाद शहरी, जयनगर, रामगढ़, सिल्ली और रांची (शहरी) में स्थिति चिंताजनक पाई गई।
2050 तक दोगुनी होगी पानी की जरूरत
विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान में 15 लाख आबादी के लिए करीब 45 एमजीडी पानी की जरूरत है, जो किसी तरह पूरी हो रही है। लेकिन वर्ष 2050 तक जब आबादी 25 लाख के पार जाएगी, तब पानी की जरूरत बढ़कर 90 एमजीडी हो जाएगी।
पेयजल विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता संजय झा के अनुसार, “भविष्य में कम से कम 45-50 एमजीडी अतिरिक्त पानी की व्यवस्था करनी होगी। अगर अभी से नए जलस्रोत विकसित नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।”
राज्य के सभी 61.72 लाख घरों तक जल कनेक्शन पहुंचाने के लिए तेजी से काम हो रहा है और योजनाबद्ध तरीके से जलापूर्ति को मजबूत किया जा रहा है। जनता को पीने का शुद्ध पानी मिले, सरकार की यह प्राथमिकता है।
योगेंद्र महतो, मंत्री, पेयजल विभाग