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अंग्रेजों के जुल्म का गवाह रांची का पहाड़ी मंदिर, आजादी के पहले दिन ऐसे लहराया था तिरंगा

Published: Sat, 15 Aug 2026 09:00 AM (GMT+05:30)

भारत की आजादी की घोषणा के बाद रांची पहाड़ी पर आधी रात को तिरंगा फहराया गया, जहां कभी शहीदों को ...और पढ़ें

एआई जेनरेटेड इमेज।

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HighLights

  1. आजादी की रात रांची पहाड़ी पर तिरंगा फहराया गया।

  2. जानकी प्रसाद ने स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई।

संजय कृष्ण, रांची। देश आजादी का उत्सव मना रहा है। आज स्वतंत्रता दिवस है। इसकी आजादी के लिए छोटानागपुर के पठार पर अनेक लोगों ने अपना बलिदान दिया, जेल गए और देश को आजाद कराया। जब लंबी गुलामी के बाद आजादी की घोषणा हुई, रांची की पठारी भेर, तुरही और नगाड़ों से गूंज उठी।

14-15 अगस्त की दरम्यानी रात को अनेक लोग रांची पहाड़ी पर पहुंच गए और आन-बान-शान का प्रतीक तिरंगा को फहराया। यह वह स्थान था, जहां अंग्रेजी आजादी के मतवालों को फांसी पर लटकाकर शहीद चौक पर पेड़ पर लटका देते थे ताकि लोगों के में दहशत फैले। उस रात, उसी पठारी पर तिरंगा फहराया गया।

कहते हैं, 1947 को जब आजादी की घोषणा हुई उस वक्त जानकी प्रसाद रांची में ही थे। स्वाधीनता की घोषणा होते ही अर्धरात्रि के बाद जानकी बाबू के नेतृत्व में स्वतंत्रता सेनानियों ने नगाड़ा बजाते हुए चुटिया राम मंदिर से एक जुलूस निकाला, जो रांची पहाड़ी पर जाकर समाप्त हुआ। इस जुलूस में सभी जाति धर्म के लोग शामिल थे।

आजादी मिलने के बाद ही अपने प्रण के अनुसार जानकी प्रसाद अपने घर में प्रवेश किए। जानकी प्रसाद और उनके सहयोगियों ने आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाई ही, उसके बाद रांची में शहीदों, स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृतियों को सजोने संवारने और उनके प्रति अपने दायित्वों को निभाने की दिशा में जो प्रयास किया है वैसे उदाहरण कम ही मिलते हैं।

इसके दस साल बाद, 1957 में जब पूरा देश 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शताब्दी साल मना रहा था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पं नेहरू ने 1857 के शहीदों के शहीद स्थलों को विकसित करने का आह्वान किया और इस आशय का संदेश भी केंद्र सरकार के गजट में प्रकाशित हुआ।

इससे प्रभावित होकर रांची के स्वतंत्रता सेनानियों ने डॉ. यदुगोपाल मुखर्जी तथा जानकी प्रसाद के नेतृत्व में रांची जिला स्कूल के पास उस स्थान को चिन्हित किया, जहां 1857 के संग्राम के योद्धा अमर शहीद ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव एवं शहीद पांडे गणपत राय के साथ सैकड़ों सेनानियों को फांसी दी गई थी।

इसे शहीद स्मारक के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया, तद्नुसार 16 अगस्त 1957 को इस स्मारक का उद्घाटन बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्र डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने किया। इस सभा की अध्यक्षता डॉ. यदुगोपाल मुखर्जी ने की और स्वागत भाषण जानकी प्रसाद ने किया था।

इस स्मारक के निर्माण और विकास की जिम्मेदारी इनके अनुज एवं स्वतंत्रता सेनानी युगलकिशोर साहू ने संभाला और बखूबी निभाया भी। जानकी प्रसाद जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने जरूरत के समय देश की भरपूर सेवा की परन्तु आजादी के बाद अपने लिए कुछ नहीं मांगा, बल्कि एक संन्यासी का जीवन जीते हुए दुनिया से विदा हो लिए।

जानकी बाबू का निधन पुंडुचेरी के अरविन्दो आश्रम में ही 13 अप्रैल 1984 को हुआ। उनकी पत्नी मोती बेन का भी निधन 1990 में केरल के आनन्द आश्रम में हुआ। इनका पूरा परिवार ही स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल था।

तब से फहाराया जाता है तिरंगा

रांची पहाड़ी देश का पहला मंदिर है, जहां 15 अगस्त व 26 जनवरी को तिरंगा फहराया जाता है। यहां पर एक विशाल तिरंगा के लिए विशाल पोल लगा, लेकिन वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। पोल आज भी खड़ा है। खैर, पहाड़ी पर आज भी लोग तिरंगा फहराते हैं और गुमनाम शहीदों को याद करते हैं। इसके साथ ही शहीद स्मारक स्थल पर भी कार्यक्रम होता है।