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    खंडहरों में दफन 'मिनी इंग्लैंड' का गौरव: मैक्लुस्कीगंज के उन आलीशान बंगलों का सच, जो अब सिर्फ यादों में जिंदा हैं

    Updated: Sun, 15 Mar 2026 05:05 AM (IST)

    झारखंड की राजधानी रांची के पास स्थित मैक्लुस्कीगंज, कभी एंग्लो-इंडियन समुदाय का 'मिनी इंग्लैंड' था। 1930 के दशक में बसा यह कस्बा अपनी यूरोपीय जीवनशैली ...और पढ़ें

    खंडहर में तब्‍दील होता मैक्लुस्कीगंज का गिरजाघर।

    खंडहर में तब्‍दील होता मैक्लुस्कीगंज का गिरजाघर।

    HighLights

    1. पलायन और उपेक्षा से ऐतिहासिक बंगले खंडहर में बदल रहे।

    2. पर्यटन, शिक्षा से पुनरुद्धार की उम्मीद, सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक।

    जागरण संवाददाता, मैक्लुस्कीगंज। झारखंड की राजधानी रांची में घने जंगलों और पहाड़ों के बीच बसा मैक्लुस्कीगंज आज एक दोराहे पर खड़ा है। 1930 के दशक में एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए एक स्वप्निल बस्ती के रूप में बसाया गया यह कस्बा कभी अपनी अनूठी संस्कृति और यूरोपीय जीवनशैली के लिए जाना जाता था।
     
    लेकिन आज, यह ऐतिहासिक स्थल अपने गौरवशाली अतीत और उपेक्षित वर्तमान के बीच संघर्ष कर रहा है। इसके अस्तित्‍व पर खतरा मंडरा रहा है। 
     

    स्वप्निल अतीत: जब इसे कहा जाता था 'मिनी इंग्लैंड' 

    1933 में अर्नेस्ट टिमोथी मैक्लुस्की द्वारा बसाई गई यह बस्ती कभी खुशहाली का प्रतीक थी। उस दौर में यहां बने शानदार अंग्रेजी शैली के बंगले, क्लब, चर्च और स्कूल एक समृद्ध समाज की झलक पेश करते थे। 
     
    दूर-दराज से लोग यहां की आबोहवा और सामाजिक गतिविधियों का आनंद लेने आते थे। यह स्थान एंग्लो-इंडियन समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा था। 
     

    पलायन की मार: वीरान हुए गलियारे 

    समय बदला और बेहतर रोजगार व भविष्य की तलाश में यहां के अधिकांश एंग्लो-इंडियन परिवार यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और भारत के बड़े शहरों की ओर पलायन कर गए। नतीजा यह हुआ कि कभी गुलजार रहने वाले बंगले आज वीरान हैं। 
     
    कई ऐतिहासिक इमारतें अब खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं, जबकि कुछ अब भी पुरानी शान-ओ-शौकत की गवाही दे रही हैं। यह कस्बा धीरे-धीरे अपनी मूल आबादी और रौनक खोता चला गया। 
     

    ग्रामीण बुनियादी ढांचा: विकास की बाट जोहता इलाका 

    मैक्लुस्कीगंज की चुनौती सिर्फ ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी भी है।

    •     शिक्षा और स्वास्थ्य: उच्च शिक्षा संस्थानों और आधुनिक अस्पतालों का अभाव यहां के विकास में सबसे बड़ी बाधा है।
    •     परिवहन और रोजगार: सुगम परिवहन और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों की कमी के कारण वर्तमान पीढ़ी भी यहां से पलायन करने को मजबूर है। दैनिक जरूरतों के लिए ग्रामीणों को आज भी मीलों दूर का सफर तय करना पड़ता है।


    उम्मीद की किरण: पर्यटन और शिक्षा 

    इन चुनौतियों के बावजूद, मैक्लुस्कीगंज की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण आज भी सैलानियों और फिल्म निर्माताओं को आकर्षित करता है। हाल के वर्षों में कुछ निजी स्कूलों की सफलता ने इस क्षेत्र को 'एजुकेशन हब' के रूप में एक नई पहचान दी है। 
     
    स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि सरकार यहां की धरोहरों का संरक्षण करे और इको-टूरिज्म को बढ़ावा दे, तो मैक्लुस्कीगंज फिर से विश्व मानचित्र पर चमक सकता है।

    मैक्लुस्कीगंज केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विरासत है। इसे बचाने के लिए सिर्फ वादों की नहीं, बल्कि धरातल पर योजनाबद्ध तरीके से काम करने की जरूरत है।