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    झारखंड HC का बड़ा फैसला: महिला सुपरवाइजर पदों पर सिर्फ महिलाओं की नियुक्ति वैध

    Updated: Tue, 24 Mar 2026 06:43 PM (IST)

    झारखंड हाई कोर्ट ने महिला सुपरवाइजर पदों पर केवल महिलाओं की नियुक्ति को संवैधानिक माना है। कोर्ट ने कहा कि यह 100% आरक्षण नहीं, बल्कि राज्य की नीति है ...और पढ़ें

    शैक्षणिक योग्यता मामले की सुनवाई अब एकल पीठ में होगी।

    शैक्षणिक योग्यता मामले की सुनवाई अब एकल पीठ में होगी।

    HighLights

    1. महिला सुपरवाइजर पदों पर सिर्फ महिलाओं की नियुक्ति संवैधानिक।

    2. नियुक्ति प्रक्रिया पर लगी अंतरिम रोक हाई कोर्ट ने हटाई।

    राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने महिला सुपरवाइजर के पदों पर केवल महिलाओं की नियुक्ति से संबंधित नियमों को प्राथमिक रूप से संवैधानिक माना है।

    अदालत ने नियुक्ति प्रक्रिया पर लगाई गई अंतरिम रोक भी हटा ली है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला नियमों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाने वाला नहीं था, क्योंकि प्रार्थी स्वयं महिलाएं हैं और उन्होंने नियमावली को चुनौती नहीं दी थी।

    पीठ ने कहा कि यह मामला शत प्रतिशत आरक्षण का नहीं, बल्कि राज्य की नीति का मामला है कि एकीकृत बाल विकास सेवा योजना के तहत गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों की देखभाल को देखते हुए यह पद महिलाओं के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।

    कोर्ट ने शैक्षणिक योग्यता पर सुनवाई के लिए मामला एकल पीठ में भेज दिया है।

    अदालत ने कहा कि नियुक्ति पत्र में इस बात की जानकारी भी दी जाए कि एकल पीठ के अंतिम आदेश से नियुक्ति प्रक्रिया प्रभावित होगी।

    19 मार्च को सभी पक्षों की ओर से बहस पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यह पद सिर्फ महिलाओं के लिए सृजित किया गया है।

    जिसे आरक्षण की बजाय कार्य की प्रकृति और लक्षित समूह के आधार पर एक उचित वर्गीकरण के रूप में देखा जाना चाहिए।

    अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 15(3) के तहत राज्य सरकार महिलाओं के लिए विशेष प्रविधान कर सकती है और यह शक्ति अनुच्छेद 16 द्वारा सीमित नहीं है।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा मुख्य रूप से अनुच्छेद 16(4) के तहत पिछड़े वर्गों के आरक्षण पर लागू होती है, और यह मामला उस श्रेणी में नहीं आता है।

    अदालत ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है, जिस पर स्वत: संज्ञान लेते हुए नियमावली को चुनौती दी जाए।

    प्रार्थियों की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार, चंचल जैन और अमृतांश वत्स ने पक्ष रखा था। अधिवक्ता अनूप कुमार मेहता ने न्याय मित्र के रूप में अदालत की सहायता की थी।

    अब तक क्या हुआ 

    बता दें कि जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने 28 अगस्त 2025 को यह कहते हुए नियुक्तियों पर रोक लगा दी थी कि 100 प्रतिशत आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन हो सकता है।

    इस आदेश को खंडपीठ ने निरस्त कर दिया। अदालत ने शत प्रतिशत पद आरक्षित करने पर इस मामले को खंडपीठ में सुनवाई के लिए भेजा था।

    एकल पीठ ने यह बिंदु उठाया था कि कोई पद शत- प्रतिशत प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकता है या नहीं।

    बता दें कि जेएसएससी ने बाल कल्याण विभाग में महिला सुपरवाइजर के 421 पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया था।

    प्रार्थी भी इस परीक्षा शामिल हुए लेकिन आयोग की ओर से प्रार्थियों का चयन यह कहते हुए नहीं किया कि इनकी शैक्षणिक योग्यता विज्ञापन की शर्तों के अनुरूप नहीं है।

    प्रार्थियों के पास विज्ञापन में निर्धारित मुख्य विषय की बजाय सहायक विषयों की डिग्री है। जबकि नियुक्ति नियमावली में ऐसा नहीं है।

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