बोकारो स्टील प्लांट की खाली जमीन पर हल चलाएंगे: चंपई का झारखंड के विस्थापितों को लेकर अल्टीमेटम
झारखंड के पूर्व सीएम चंपई सोरेन ने SAIL बोकारो स्टील प्लांट के विस्थापितों की समस्याओं पर डेढ़ महीने का अल्टीमेटम दिया है। सोरेन ने 1960 के भूमि अधिग् ...और पढ़ें

चंपई सोरेन करेंगे विस्थापितों की समस्याओं पर बड़ा आंदोलन।
HighLights
चंपई सोरेन ने बोकारो स्टील प्लांट को डेढ़ महीने का अल्टीमेटम दिया।
विस्थापितों को नौकरी न मिलने पर खाली जमीन पर हल चलाने की चेतावनी।
1960 के भूमि अधिग्रहण और अधूरे वादों पर सवाल उठाए।
डिजिटल डेस्क, रांची। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा नेता चंपई सोरेन ने फेसबुक पर एक लंबा पोस्ट लिखकर बोकारो स्टील प्लांट (बीएसएल) के विस्थापितों की दशकों पुरानी समस्याओं को लेकर राज्य सरकार और प्लांट प्रबंधन को डेढ़ महीने का अल्टीमेटम दे दिया है।
उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर अप्रेंटिसशिप पूरा कर चुके युवाओं को नौकरी नहीं दी गई और विस्थापितों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो लाखों लोग रैयतों के साथ मिलकर प्लांट की खाली पड़ी हजारों एकड़ जमीन पर हल चलाएंगे।
सोरेन ने अपने पोस्ट में 1960 के दशक में हुए भूमि अधिग्रहण का जिक्र करते हुए बताया कि बीएसएल के लिए करीब 34,000 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी, लेकिन उसमें से मात्र आधी जमीन पर सेल की ओर से प्लांट बना, अन्य निर्माण हुए। हजारों एकड़ जमीन आज भी खाली पड़ी है।
अधिग्रहण के वक्त के वादे सब हवा-हवाई
उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की धारा 24(2) का हवाला देते हुए कहा कि पुराने अधिग्रहण के मामलों में अगर सरकार के पास भौतिक कब्जा नहीं है या मुआवजा नहीं दिया गया तो अधिग्रहण प्रक्रिया खुद-ब-खुद समाप्त मानी जाएगी।
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पूर्व CM ने आरोप लगाया कि अधिग्रहण के समय जो वादे किए गए थे, उन्हें पूरा नहीं किया गया। विस्थापितों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। हजारों परिवारों को मुआवजा नहीं मिला।
64 मौजों की भूमि अधिग्रहित हुई, जिनमें सैकड़ों गांवों में आज भी लाखों लोग बसे हुए हैं। ये लोग पंचायत से बाहर होने के कारण पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य जैसी सरकारी योजनाओं से वंचित हैं।
60 वर्ष में भूमी का उपयोग नहीं कर पाए
उनके गांवों-टोलों को सरकारी रिकॉर्ड से गायब कर दिया गया है, जिससे जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं।
सोरेन ने सवाल उठाया, जब 60 वर्षों तक भूमि का इस्तेमाल नहीं कर पाए और कई हिस्सों पर कब्जा भी नहीं है, तो उस जमीन को रैयतों को क्यों नहीं लौटाया जा रहा?
कम से कम वे लोग खेती-बाड़ी करके परिवार का पालन-पोषण तो कर सकेंगे। उन्होंने 1973 की घटना का भी जिक्र किया, जब बीएसएल प्रशासन ने खुद घोषणा की थी कि 20 मौजा की भूमि प्लांट के लिए जरूरी नहीं है, क्योंकि अतिरिक्त (surplus) जमीन उपलब्ध थी।
मॉल और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स कैसे बना रहे?
इसके बावजूद मूल रैयतों को कानूनी स्वामित्व वापस नहीं दिया गया। वे गांवों में रहते रहे, लेकिन जमीन सरकारी/प्लांट के नाम पर बनी रही।
न पूर्ण मुआवजा मिला, न नौकरी, न स्वामित्व। पूर्व मुख्यमंत्री ने मॉल-शॉपिंग सेंटरों का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने पूछा कि जब यह क्षेत्र किसी नगर निकाय के अंतर्गत नहीं आता, तो लैंड यूज कन्वर्जन की अनुमति किसने दी?
कैसे अवैध तरीके से इनकी पुश्तैनी जमीन पर मॉल बन रहे हैं? भूमि राजस्व विभाग और शहरी स्थानीय निकाय की अनुमति के बिना यह कैसे संभव हो रहा है?
सोरेन ने अपील करते हुए कहा कि जिस क्षेत्र से झारखंड आंदोलन शुरू हुआ और अलग राज्य के लिए संघर्ष का नेतृत्व हुआ, वहां विस्थापितों की यह हालत किसकी जिम्मेदारी है?
चांडिल, मसानजोर, मैथन भी मुद्दा
उन्होंने चेतावनी दी कि चांडिल, मसानजोर, पंचेत, मैथन, घाटो, कोयलांचल और राज्य की अन्य परियोजनाओं के लाखों विस्थापितों के मुद्दों का समाधान भी इसी तरह आंदोलन से होगा।
अंत में सोरेन ने लिखा, “अगर अगले डेढ़ महीनों में अप्रेंटिसशिप कर चुके युवाओं को नौकरी तथा विस्थापितों की समस्याओं का समाधान नहीं होता है, तो इस क्षेत्र में एक बड़ा जन आंदोलन शुरू होगा।
सभी रैयतों के साथ लाखों लोग एकजुट होकर बोकारो स्टील प्लांट की खाली पड़ी जमीन पर हल चलाएंगे।” यह पोस्ट इंटरनेट मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और झारखंड की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।
फिलहाल बीएसएल प्रबंधन और राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। यहां गौरतलब है कि यह मुद्दा केंद्र और राज्य सरकार दोनों का है। चंपई ने इश्यू का जिम्मेदार सिर्फ राज्य सरकार को बताया है।
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