टाटा स्टील का ₹2500 करोड़ का निवेश, जमशेदपुर में ईजीमेल्ट तकनीक से 50 प्रतिशत तक घटेगी कोक की खपत
टाटा स्टील जमशेदपुर वर्क्स में कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए ₹2500 करोड़ का निवेश कर रही है। यह निवेश ईजीमेल्ट तकनीक के माध्यम से होगा, जिससे कोक की खप ...और पढ़ें

जमशेदपुर के ई ब्लास्ट फर्नेस में दुनिया की पहली पर्यावरण अनुकूल तकनीक लगाने के लिए एसएमएस ग्रुप के साथ समझौता।
HighLights
टाटा स्टील जमशेदपुर में ₹2500 करोड़ का निवेश।
ईजीमेल्ट तकनीक से कोक खपत 50% तक कम।
2045 तक नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य की ओर कदम।
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। देश की प्रमुख इस्पात उत्पादक कंपनी टाटा स्टील ने अपने जमशेदपुर वर्क्स में कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम स्तर पर लाने के लिए 2,500 करोड़ रुपये के बड़े निवेश की घोषणा की है।
इस निवेश के जरिए कंपनी अपने ई ब्लास्ट फर्नेस में अत्याधुनिक ईजीमेल्ट तकनीक स्थापित करेगी। लक्जमबर्ग की कंपनी एसएमएस ग्रुप के सहयोग से शुरू हो रही यह परियोजना दुनिया में इस तकनीक की पहली औद्योगिक पैमाने की प्रदर्शनी होगी, जिससे ब्लास्ट फर्नेस में कोयले से बनने वाले ईंधन (कोक) की खपत लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो जाएगी।
ईजीमेल्ट तकनीक: कार्यप्रणाली और विशेषता
ईजीमेल्ट (इलेक्ट्रिकली-असिस्टेड सिनगैस स्मेल्टर) एक ऐसी उन्नत तकनीक है जो ब्लास्ट फर्नेस से निकलने वाली अपशिष्ट गैसों (वेस्ट गैस) को उपयोगी ऊर्जा और रासायनिक एजेंटों में परिवर्तित कर देती है। यह मुख्य रूप से तीन प्रक्रियाओं को एकीकृत करती है - ड्राई रिफॉर्मिंग, शाफ्ट इंजेक्शन और ट्यूयर इंजेक्शन।
साधारण ब्लास्ट फर्नेस में लौह अयस्क से आक्सीजन हटाने और अत्यधिक तापमान पैदा करने के लिए भारी मात्रा में कोक (कोयले का शुद्ध रूप) का उपयोग किया जाता है, जो कार्बन उत्सर्जन का सबसे बड़ा कारण है।
ईजीमेल्ट तकनीक के तहत, फर्नेस से निकलने वाले मीथेन-युक्त कोक ओवन गैस और कार्बन डाइआक्साइड को सिनगैस (कार्बन मोनो आक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण) में बदल दिया जाता है। यह सिनगैस एक स्वच्छ एजेंट के रूप में काम करती है।
जब इस गैस को इलेक्ट्रिक हीटिंग के माध्यम से फर्नेस के ऊपरी हिस्से में इंजेक्ट किया जाता है, तो फर्नेस का तापमान बढ़ जाता है और कार्बन पर आधारित रासायनिक प्रतिक्रियाओं की निर्भरता कम हो जाती है।
कोक की खपत और उत्सर्जन में भारी कमी
इस तकनीक के पूर्ण क्रियान्वयन के बाद, ई ब्लास्ट फर्नेस में प्रति टन हाट मेटल उत्पादन पर कोक की खपत वर्तमान के 440 किलोग्राम से घटकर केवल 220 किलोग्राम रह जाएगी। टाटा स्टील का लक्ष्य इस परियोजना के माध्यम से कार्बन उत्सर्जन को 50 प्रतिशत से अधिक कम करना है।
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ब्राउनफील्ड प्लांट के लिए सबसे सस्ता विकल्प
पूरी तरह से नए और हरित इस्पात कारखानों (ग्रीनफील्ड प्लांट) के निर्माण में भारी पूंजी और समय की आवश्यकता होती है। ऐसे में टाटा स्टील ने अपने मौजूदा संयंत्रों (ब्राउनफील्ड एसेट्स) को ही पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए रेट्रोफिटिंग (संशोधन) का रास्ता चुना है, जो बेहद लागत प्रभावी है।
जमशेदपुर में इस पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद, कंपनी इसे अपने कुल ब्लास्ट फर्नेस के 20 प्रतिशत हिस्से तक विस्तारित करने की योजना बना रही है। इससे करीब 40 से 50 लाख टन हाट मेटल का उत्पादन हरित तकनीक के दायरे में आ जाएगा।
नेट जीरो 2045 की दिशा में मजबूत कदम
टाटा स्टील के सीईओ व एमडी टीवी नरेंद्रन ने इस साझेदारी पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि कार्बन मुक्त इस्पात निर्माण का भविष्य हमारे मौजूदा संयंत्रों को बदलने की क्षमता पर निर्भर करता है।
एसएमएस ग्रुप के साथ यह सहयोग कंपनी के वर्ष 2045 तक पूर्ण रूप से नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने के लक्ष्य में मील का पत्थर साबित होगा। इससे पहले कंपनी प्रदूषण कम करने के लिए हाईसारना तकनीक पर भी काम कर चुकी है, लेकिन ईजीमेल्ट मौजूदा फर्नेस को बदलने का सबसे व्यावहारिक उपाय है।