झारखंड हाईकोर्ट की दो टूक: केवल नोटिस पर सीधे कोर्ट आना सही नहीं, टाटा स्टील को माडा के पास जाने का निर्देश
झारखंड उच्च न्यायालय ने धनबाद की मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (माडा) के मार्केट फीस नोटिस के खिलाफ टाटा स्टील की याचिका पर सीधी दखल देने से इनकार कर दिया है।

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने टाटा स्टील को कोई भी सीधी अदालती राहत देने से मना करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया है।
HighLights
माडा के मार्केट फीस नोटिस के खिलाफ थी यह याचिका।
कंपनी को चार सप्ताह में माडा के समक्ष जवाब देने का निर्देश।
जासं, जमशेदपुर। झारखंड उच्च न्यायालय ने धनबाद की मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (माडा) द्वारा जारी मार्केट फीस (बाजार शुल्क) के नोटिस के खिलाफ टाटा स्टील की याचिका पर दखल देने से साफ इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कंपनी को कोई भी सीधी अदालती राहत देने से मना करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया है।
अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि किसी प्रशासनिक संस्था से केवल ''कारण बताओ नोटिस'' मिलने भर से सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना कानूनी प्रक्रिया के लिहाज से उचित नहीं है।
क्या है पूरा विवाद?
यह पूरा मामला 31 मार्च 2017 का है, जब माडा ने मार्केट फीस नियमावली 2010 के तहत टाटा स्टील को शुल्क वसूली का नोटिस जारी किया था।
टाटा स्टील का पक्ष था कि 32 गांवों में फैली उसकी कोयला खदानें तो नियमों के दायरे में आती हैं, लेकिन धनबाद नगर निगम क्षेत्र में स्थित उसके दो प्रोसेसिंग प्लांटों पर यह बाजार शुल्क लागू नहीं किया जा सकता।
कंपनी की ओर से यह आशंका भी जताई गई थी कि माडा ने पहले से ही पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर यह तय कर लिया है कि कंपनी को यह फीस चुकानी ही होगी।
अदालत ने क्यों खारिज की दलील?
हाईकोर्ट ने टाटा स्टील की पूर्वाग्रह वाली दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि नोटिस में शुल्क निर्धारण की बात कहना केवल एक शुरुआती प्रशासनिक राय है, न कि कोई अंतिम फैसला।
प्राधिकरण ने कंपनी को अपना पक्ष रखने और सुनवाई का पूरा और निष्पक्ष अवसर दिया है। अदालत ने कहा कि जब तक कोई नोटिस पूरी तरह से कानून और अधिकार क्षेत्र से बाहर न हो, तब तक पक्षकार को सीधे अदालत आने के बजाय पहले संबंधित प्राधिकरण के समक्ष ही अपनी आपत्ति दर्ज करानी चाहिए।
जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय
अदालत ने मामले के अन्य कानूनी पहलुओं पर कोई अंतिम टिप्पणी किए बिना टाटा स्टील को नोटिस का औपचारिक और विस्तृत जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
कोर्ट ने निर्देश दिया है कि कंपनी माडा के अधिकार क्षेत्र से जुड़े अपने सभी कानूनी तर्कों और बचाव को प्राधिकरण के समक्ष रख सकती है, जिसके बाद प्राधिकरण को स्थापित नियमों के तहत निष्पक्ष रूप से निर्णय लेना होगा।