हजारीबाग में 'आम' ने रसोइया को बनाया खास, मनरेगा की मदद से बन गए लखपति
कभी रसोइया रहे बासुदेव प्रसाद ने मनरेगा की मदद से हजारीबाग में 3 एकड़ में आम का बाग लगाकर लाखों कमाए हैं। उन्होंने मिश्रित खेती अपनाकर अपनी आर्थिक स्थ ...और पढ़ें
-1783425179959_m.webp)
वासुदेव प्रसाद। एआई जनरेटेड फोटो

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
मिथिलेश पाठक, टाटीझरिया (हजारीबाग)। कभी परदेश में किसी रसूखदार के यहां रसोइया का काम करने वाले 50 वर्षीय वासुदेव प्रसाद अब आम की खेती में लोगों के लिए नजीर बन चुके हैं।
इन्होंने मनरेगा के आम बागवानी की योजना 2021 में लिया और अपनी जिद के बूते 3 एकड़ की जमीन पर ऐसा आम का साम्राज्य खड़ा किया है, जो आज इलाके के लिए मिसाल बन गया है।
इस सीजन में वासुदेव अब तक 50 क्विंटल आम बाजार में उतारकर लाखों की कमाई कर चुके हैं और खास बात यह है कि उनके बगीचे के पेड़ अभी भी फलों से लदे हुए हैं।
इस सीजन अब तक 50 क्विंटल आम की बिक्री
वासुदेव प्रसाद ने बताया कि इस साल वह अपने बगीचे से 40 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से अब तक लगभग 50 क्विंटल आम बेच चुके हैं। बाजार में उनके आमों की अच्छी मांग है।
खास बात यह है कि सीजन के इस पड़ाव पर भी उनकी बागवानी के पेड़ों पर भारी मात्रा में आम लदे हुए हैं, जिससे आगे भी अच्छी कमाई की उम्मीद है।
प्रगतिशील किसान वासुदेव के मुताबिक, पिछले वर्ष भी उन्होंने करीब 30 क्विंटल आम की सफल बिक्री की थी। यानी हर साल उनका यह साम्राज्य और बड़ा हो रहा है।
मनरेगा और खुद के निवेश से खड़ा किया बगीचा
अपनी सफलता की कहानी साझा करते हुए वासुदेव ने बताया कि वर्ष 2021 में उन्होंने इस बागवानी की शुरुआत की थी। इसके लिए उन्हें सरकारी योजना मनरेगा का सहयोग मिला।
इसके साथ ही उन्होंने सिर्फ सरकारी मदद पर भरोसा नहीं किया, बल्कि खुद की जेब से भी पैसे खर्च कर बाजार से उन्नत और अच्छी किस्मों के आम के पौधे खरीदे और उन्हें रोपा। महज 4-5 वर्षों की कड़ी मेहनत और उचित देखभाल का नतीजा आज सबके सामने है।
खेती का मिश्रित मॉडल, आम के साथ सब्जियां भी
वासुदेव सिर्फ आम की खेती तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जमीन के एक-एक टुकड़े का सही उपयोग करना जानते हैं। इसके लिए वे बगीचे के भीतर ही मिश्रित खेती भी करते हैं।
आम के पेड़ों के बीच खाली बची जगह पर वे अरहर, टमाटर, बैंगन जैसी नकदी फसलों का बंपर उत्पादन कर रहे हैं, जिससे उन्हें सालभर अतिरिक्त आमदनी होती रहती है।
यूपी की नौकरी छोड़ चुनी गांव की राह
वासुदेव का अतीत संघर्षों से भरा रहा है। वर्ष 1984 तक वे उत्तर प्रदेश में एक बड़े अधिकारी के घर पर रसोइया का काम करते थे। परदेस की उस नौकरी में बंधा-बंधाया पैसा तो था, लेकिन अपनी माटी का जुड़ाव नहीं था।
खबरें और भी
आखिरकार, उन्होंने परदेस को अलविदा कहकर अपने गांव लौटने का फैसला किया और पारंपरिक ढर्रे से अलग आधुनिक खेती-बाड़ी से जुड़ गए।
अब इसी काम में रमता है मन, परिवार का मिलता है पूरा साथ
वासुदेव कहते हैं, अब मुझे इन पेड़-पौधों और खेती-किसानी में ही मन लगता है। आम की खेती ने मेरी जिंदगी बदल दी है और आज मैं आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर और खुशहाल हूं।
उन्होंने अपनी इस सफलता का श्रेय अपने परिवार को भी दिया। वासुदेव के इस आत्मनिर्भर सफर में उनके घर वाले भी कंधे से कंधा मिलाकर उनका भरपूर सहयोग करते हैं। आज वासुदेव प्रसाद कोल्हू गांव ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए एक रोल मॉडल बन चुके हैं।