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    World Tribal Day: ऑस्ट्रेलिया से लौटे BIT-BS डिग्रीधारी सुनील, रीना का मिला साथ तो दुमका में खिल उठी नर्सरी

    Updated: Sun, 09 Aug 2026 10:57 AM (IST)

    World Tribal Day 2026: ऑस्ट्रेलिया से बीआईटी-बीएस की डिग्री हासिल करने वाले सुनील थॉमस अपनी पत्नी रीना रोज हेंब्रम के साथ दुमका के दोंदिया गांव में एक ...और पढ़ें

    Tribal Day 2026: सुनील थामस और उनकी पत्नी रीना रोज हेंब्रम। (फोटो जागरण)

    Tribal Day 2026: सुनील थामस और उनकी पत्नी रीना रोज हेंब्रम। (फोटो जागरण)

    HighLights

    1. सुनील और रीना ने दुमका में हिल साइड नर्सरी शुरू की।

    2. उन्नत किस्म के फल-फूलों के पौधे उपलब्ध कराकर किसानों को प्रेरित किया।

    3. दुमका की आदिवासी महिलाएं स्ट्रॉबेरी खेती से आत्मनिर्भर बन रही हैं।

    राजीव, दुमका। International Trible Day: झारखंड की उपराजधानी दुमका प्रखंड का दोंदिया गांव दुमका-पाकुड़ मुख्य पथ के दाहिनी ओर हिल साइड नर्सरी इधर गुजरने वाले राहगीरों को बरबस ही आकर्षित करती है। खास बात यह कि इस नर्सरी को शुरु करने वाला कोई पारंपरिक किसान नहीं बल्कि बैचलर आफ इनफार्मेशन टेक्नाेलाजी इन बिजनेस सिस्टम की पढ़ाई करने वाले सुनील थामस और उनकी पत्नी रीना रोज हेंब्रम हैं।

    सुनील ने यह डिग्री आस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी आफ बलारट से हासिल की है। सुनील बताते हैं कि उन्होंने आस्ट्रेलिया में 10 वर्ष बिताए हैं। वहां वह पढ़ाई के बाद क्रास डाक्स नामक एक आयात-निर्यात करने वाली कंपनी में बतौर टीम लीडर नौकरी कर रहे थे लेकिन कोविड-19 संक्रमण के दौरान 2020 में वह आस्ट्रेलिया से वापस लौट आए।

    सुनील मूलत: बिहार के अरवल के संतावन बिगहा गांव के रहने वाले हैं। आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद सुनील दुमका के काठीकुंड के हरिपुर गांव की रहने वाली रीना रोज हेंब्रम से प्रेम विवाह करने के बाद अब दोंदिया गांव में रहकर नर्सरी चला रहे हैं।

    रीना भी धनबाद से स्नातक की पढ़ाई पूरा करने के बाद अपने पति के साथ दोंदिया में ही बसने का इरादा कर लिया है। सीना और रीना की सफलता की कहानी आदिवासियों के लिए प्रेरणादायक है।

    भविष्य में केला व ड्रैगन फ्रूट की खेती की योजना

    सुनील और रीना ने दुमका शहर से तकरीबन 10 किलोमीटर दूर दोंदिया में वैज्ञानिक तरीके से नर्सरी की शुरुआत महज 71 हजार रुपये की पूंजी से की।

    सुनील बताते हैं कि ग्रामीण इलाके में नर्सरी की स्थापना निसंदेह रिस्की था और शुरुआत के दिनों में काफी संघर्ष भी करना पड़ा लेकिन अब यह आमदनी का जरिया बन चुका है। यहां सुदूर ग्रामीण इलाकों से ही नहीं बल्कि दुमका, गोड्डा और पाकुड़ से भी बड़ी संख्या में लोग फल और फूलों का पौधा लेने पहुंचते हैं।

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    उन्नत प्रभेद के फूल और फलों के पौधे उपलब्ध

    दुमका शहर से दूर ग्रामीण इलाके में अगर मियाजाकी, ब्लैक कस्तूरी मैंगो, हनी ड्यू, किंग
    आफ चाकापट, चौसा, दूधिया मालदा समेत आम के कई उन्नत प्रभेद के पौधे सहज उपलब्ध हो तो यह आश्चर्य की बात जरूर है।

    इतना ही नहीं दोदिंया स्थित इस नर्सरी में पारंपरिक कटहल से इतर थाई कटहल, वियतनाम की सुपर अर्ली प्रभेद के कटहल के पौधे उपलब्ध हैं। नर्सरी में थाई किंग जामुन, वाटर एप्पल, चेरी, अमरुद, चीकू और रेड बनाना यानि लाल  केला के पौधे भी उपलब्ध है।

    हरे घास के शौकीनों के लिए सेलेक्शन वन्स, मैक्सिकन ग्रास, कोरियन ग्रास, गेंदा, गुलदाऊदी, गुलाब समेत कई तरह के उन्नत प्रभेद के फूल के अलावा सजावटी पौधों की यहां भरमार है।

    भविष्य में केला व ड्रैगन फ्रूट की खेती की योजना

    सुनील और रीना रोज कहते हैं कि फूल-पौधों से लगाव शुरु से रहा है लेकिन अब यह शौक जीवन जीने का आधार बन चुका है। आदिवासी समुदाय के लोग जल, जंगल और जमीन से जुड़े हैं और पारंपरिक तरीके से ही अब भी जीवन बसर करना पसंद करते हैं।

    आदिवासी समाज में अधिकांश किसान अब भी पारंपरिक तरीके से धान की खेती कर जीवन बसर करते हैं लेकिन समय के साथ बदलाव जरूरी है। पारंपरिक तरीकों के साथ विज्ञानी व आधुनिक तकनीक को अपना कर ही तरक्की की राह आसन की जा सकती है।

    इसी सोच के साथ ग्रामीण इलाकों में नर्सरी की स्थापना किए हैं जिसका परिणाम काफी सुखद और सकारात्मक है। गांव के किसान यहां से उन्नत प्रभेद के फलों के पौधे ले जाकर बंजर जमीन पर उद्यान लगा रहे हैं।

    कई किसान फूलों की खेती कर अतिरिक्त आमदनी करने लगे हैं। कहा कि भविष्य में उनकी योजना है कि बंजर जमीन लीज पर बड़े पैमाने पर केला व ड्रैगन फ्रूट की खेती करेंगे। 

    दुमका की आदिवासी महिलाएं कर रहीं स्ट्राबेरी की खेती

    झारखंड की उपराजधानी दुमका की आदिवासी महिला किसान अब स्ट्राबेरी की खेती कर आर्थिक तौर पर स्वावलंबी बन रही हैं। खास बात यह कि दुमका के उपायुक्त अभिजीत सिन्हा के इस ड्रीम प्रोजेक्ट से जेएसएलपीएस से जुड़ी अधिकांश आदिवासी महिला समूहों की किसानों को विशेष तौर पर जोड़ा गया है।

    इसके लिए उद्यान विकास की योजना के तहत 50 हेक्टेयर भू-भाग में टिश्यू कल्चर स्ट्राबेरी की खेती के लिए पुणे से स्ट्राबेरी के पौधे चिह्नित प्रखंडों के किसानों को उपलब्ध कराया है।

    चिह्नित किसानों के बीच जेएसएलपीएस के माध्यम से 346 किसानों के बीच तकरीबन 756000 पौधे उपलब्ध कराए गए हैं जिसमें 309 महिला किसान हैं। दुमका में स्ट्राबेरी की खेती कर हजारों में कमाई करने वाली किसानों में रानी सोरेन, निर्मला मुर्मू, सुंदरी सोरेन समेत कई नाम शामिल है।

    समय के साथ बदलाव जरूरी है। पारंपरिक खेती से इतर अब समय आधुनिक व विज्ञानी तरीके से खेती कर अतिरिक्त आमदनी करने की है। गांव में नर्सरी स्थापित करना सहज नहीं था लेकिन आसपास के गांव के किसान अब उन्नत प्रभेद के पौधों का उद्यान लगा रहे हैं। फूलों की खेती कर रहे हैं। प्रयास यह है कि इन्हें आधुनिक और इंटीग्रेटेड फार्मिंग के बारे में लगातार जानकारी दी जाए ताकि इनकी आमदनी में बढ़ोत्तरी हो सके।

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    सुनील थामस, नर्सरी संचालक

    स्ट्रोबरी, जरबेरा, शिमला मिर्च ही नहीं देशी कटहल के कई उन्नत प्रभेद की खेती के लिए अब किसान यहां से पौधे लेकर जा रहे हैं। डिमांड पूरी करने के लिए कोलकाता के हाथीसाला नर्सरी से पौधा मंगवाते हैं। नर्सरी में भी कई उन्नत प्रभेद के पौधे तैयार किया जाता है जिसमें इंटरनेट की मदद लेते हैं। भविष्य में सरकार से मदद लेकर कई योजनाओं को धरातल पर उतारने की पहल करने का पक्का इरादा है।

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    रीना रोज हेंब्रम, नर्सरी संचालिका