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    क्रोध और अहंकार मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु, विनम्रता और भक्ति ही सच्चा बल: राजन जी महाराज

    Updated: Mon, 20 Jul 2026 09:33 PM (IST)

    राजन जी महाराज ने धनबाद में श्री राम कथा के दौरान क्रोध और अहंकार को मनुष्य का शत्रु बताया, विनम्रता और भक्ति को सच्चा बल कहा। ...और पढ़ें

    धनबाद के कंचनडीह में श्रीरामकथा का वाचन करते मानस मर्मज्ञ राजन जी महाराज। (फोटो जागरण)

    धनबाद के कंचनडीह में श्रीरामकथा का वाचन करते मानस मर्मज्ञ राजन जी महाराज। (फोटो जागरण)

    HighLights

    1. क्रोध और अहंकार मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं।

    2. विनम्रता, धैर्य और भक्ति ही सच्चा बल है।

    3. सीताराम विवाह प्रेम और मर्यादा का दिव्य संगम है।

    संवाद सूत्र, मुगमा (धनबाद)। प्रसिद्ध श्री राम कथा वाचक राजन जी महाराज ने कहा है कि  क्रोध और अहंकार मनुष्य के बल के सबसे बड़े शत्रु हैं। जिसके भीतर अहंकार होता है, वह अपने सामर्थ्य का भी सही उपयोग नहीं कर पाता, जबकि सच्चा बल वही है जिसमें विनम्रता, धैर्य और भक्ति का समावेश हो।

    Ram Katha Nirsa

    राजनजी महाराज निरसा के कंचनडीह में चल रहे श्री राम कथा के दाैरान सोमवार को धनुष यज्ञ प्रसंग का वर्णन किया। उन्होंने कहा-भगवान श्रीराम ने शिव धनुष को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए नहीं, बल्कि गुरु विश्वामित्र की आज्ञा का पालन करने के लिए उठाया। यही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का आदर्श है।

    कंचनडीह में विरेंद्र राय एवं परिवार के सौजन्य से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के पंचम दिवस पर धनुष यज्ञ एवं श्री सीताराम विवाह महोत्सव का दिव्य आयोजन हुआ। मानस मर्मज्ञ राजन जी महाराज ने अपने ओजस्वी एवं रसपूर्ण कथावाचन से श्रद्धालुओं को मिथिला नगरी की पावन यात्रा कराई। कथा स्थल पर उपस्थित हजारों श्रद्धालु पूरे समय भक्ति, भाव और उल्लास में डूबे रहे।

    उन्होंने कहा कि जीवन में जो कुछ भी घटित होता है, वह ईश्वर की योजना का भाग होता है। गुरु विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए लेकर निकले थे, किन्तु उसी मार्ग में मिथिला पहुंचकर भगवान श्रीराम और माता जानकी का दिव्य मिलन हुआ। यदि मनुष्य प्रत्येक परिस्थिति को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करे, तो अंततः उसका जीवन भी मंगलमय हो जाता है।

    पुष्पवाटिका प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन करते हुए महाराज श्री ने कहा कि जब भगवान श्रीराम और माता जानकी की पहली दृष्टि मिली, तब मानो पूरी वाटिका पुलकित हो उठी। वृक्ष, लताएं और पुष्प भी उस दिव्य क्षण के साक्षी बन आनंद से झूम उठे। यह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, प्रेम और आदर्श का संगम था।

    धनुष यज्ञ के बाद आयोजित श्री सीताराम विवाह महोत्सव ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। पूज्य राजन जी महाराज के मधुर भजनों पर श्रद्धालु देर तक झूमते रहे। महिलाओं ने मंगलगीत गाए, श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा की और पूरा कथा पंडाल जनकपुर के विवाहोत्सव का सजीव दृश्य प्रस्तुत करता दिखाई दिया।

    विवाह प्रसंग के माध्यम से महाराज श्री ने समाज को प्रेरक संदेश देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का पवित्र मिलन है। जनकपुर में राजा जनक और अयोध्या से आए सेवकों ने मिलकर व्यवस्था संभाली थी। आज भी विवाह समारोहों में सहयोग, सेवा और विनम्रता का भाव होना चाहिए। यदि कहीं कोई कमी रह जाए तो उसे आलोचना का विषय नहीं, बल्कि सहयोग का अवसर समझना चाहिए।

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    महाराज श्री ने कहा कि जहां प्रेम होता है, वहीं भगवान श्रीराम का निवास होता है। इसलिए जीवन से क्रोध, अहंकार और द्वेष को दूर कर प्रेम, सेवा, मर्यादा और रामभक्ति को अपनाना ही श्रीरामकथा का वास्तविक संदेश है। जय श्रीराम के उद्घोष के बीच आयोजन की उत्कृष्ट व्यवस्था के लिए श्रद्धालुओं ने आयोजक श्री वीरेन्द्र राय एवं परिवार का आभार व्यक्त किया।

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