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देवघर में क्यों नहीं होता रावण दहन? जानिए 'रावणेश्वर महादेव' से जुड़ी यह अद्भुत पौराणिक कथा

Published: Wed, 14 Oct 2026 08:40 PM (IST)

देवघर में दशहरा पर लंकापति रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता है, क्योंकि स्थानीय लोग उन्हें भगवान शिव का ...और पढ़ें

बाबा की नगरी में नहीं किया जाता रावण दहन (AI Generated Image)

बाबा की नगरी में नहीं किया जाता रावण दहन (AI Generated Image)

HighLights

  1. रावण को बाबा बैद्यनाथ धाम में शिव भक्त मानते हैं।

  2. कामनालिंग की स्थापना रावण की कठोर तपस्या से हुई थी।

  3. देवघर में रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता।

अजय परिहस्त, देवघर। देशभर में जहां दशहरा के अवसर पर लंकापति रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर में रावण को एक अलग दृष्टि से देखा जाता है।

यहां रावण को केवल लंका के राजा के रूप में नहीं, बल्कि भगवान शिव के परम भक्त और बाबा बैद्यनाथधाम की पौराणिक महिमा से जुड़े महत्वपूर्ण पात्र के रूप में स्मरण किया जाता है। स्थानीय मान्यताओं और तीर्थ पुरोहितों की परंपरा में रावण के प्रति विशेष आदर का भाव दिखाई देता है।

यही कारण है कि यहां रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता है। मान्यता है कि रावण की कठोर तपस्या और अनन्य शिवभक्ति के कारण ही देवघर को कामनालिंग के रूप में बाबा बैद्यनाथ की दिव्य उपस्थिति का गौरव प्राप्त हुआ।

रावण की तपस्या से जुड़ी है कामनालिंग की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, लंकापति रावण महर्षि विश्रवा और कैकसी के पुत्र थे। ब्राह्मण कुल में जन्मे रावण को चारों वेदों का ज्ञाता, प्रकांड विद्वान और भगवान शिव का अनन्य उपासक बताया गया है।

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की और अपने सिर तक अर्पित कर दिए। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें कामनालिंग प्रदान किया, जिसे लेकर रावण लंका जाना चाहता था।

भगवान शिव ने रावण के सामने शर्त रखी कि रास्ते में शिवलिंग को कहीं भी धरती पर नहीं रखना है। यदि शिवलिंग भूमि पर रख दिया गया, तो वह वहीं स्थापित हो जाएगा। रावण इस शर्त को स्वीकार कर शिवलिंग लेकर लंका की ओर चल पड़ा।

देवलीला से देवघर में स्थापित हुए बाबा

कथा के अनुसार, देवताओं को आशंका थी कि यदि कामनालिंग लंका पहुंच गया, तो रावण की शक्ति और बढ़ जाएगी। इसके बाद ऐसी लीला हुई कि रास्ते में रावण को लघुशंका की आवश्यकता महसूस हुई।

वह शिवलिंग को कुछ देर के लिए एक ग्वाले का रूप धरे भगवान विष्णु के हाथों में सौंपकर चला गया। स्थानीय पौराणिक गाथाओं में उस ग्वाले को बैजू के नाम से याद किया जाता है।

ग्वाले ने शिवलिंग को भूमि पर रख दिया। लौटने पर रावण ने शिवलिंग को उठाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह अपने स्थान से नहीं हिला। इस तरह कामनालिंग देवघर में स्थापित हो गया।

इसी मान्यता के कारण बाबा बैद्यनाथ को रावणेश्वर महादेव के नाम से भी संबोधित किया जाता है। मंदिर की पूजा परंपरा में 'श्री श्री 108 रावणेश्वर बाबा वैद्यनाथ' नाम का विशेष महत्व बताया जाता है।

यहां शिव के साथ शक्ति की भी होती है आराधना

बाबा बैद्यनाथ धाम की विशेषता केवल द्वादश ज्योतिर्लिंगों में इसकी मान्यता तक सीमित नहीं है। यहां बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के साथ माता सती से जुड़ी शक्तिपीठ की परंपरा भी प्रचलित है।

मान्यता है कि सती के शरीर के खंडों में से उनका हृदय इसी स्थान पर गिरा था। इस कारण बाबाधाम को शिव और शक्ति की संयुक्त उपासना का विशिष्ट केंद्र माना जाता है।

यहां आने वाले श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के साथ माता की आराधना भी करते हैं। स्थानीय धार्मिक आस्था में इस स्थल को शिव और शक्ति के अद्भुत संगम के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि देवघर की धार्मिक पहचान में ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ, दोनों का विशेष स्थान है।

हरिहर मिलन की परंपरा भी है खास

बाबा बैद्यनाथ धाम की धार्मिक परंपराओं में हरिहर मिलन का भी विशेष महत्व है। हरि अर्थात भगवान विष्णु और हर अर्थात भगवान शिव के मिलन की इस परंपरा को देवघर की विशिष्ट धार्मिक पहचान माना जाता है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, हरलाजोड़ी से जुड़ा प्रसंग भी इसी परंपरा की याद दिलाता है। यहां भगवान विष्णु के चरणचिह्न से जुड़ी मान्यता प्रचलित है। होली के अवसर पर बाबा मंदिर में हरिहर मिलन की परंपरा निभाई जाती है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अनुष्ठान के बाद ही देवघर में होली खेलने की शुरुआत होती है। इस परंपरा में शिव और विष्णु के अभिन्न संबंध का संदेश निहित है।

रावण को अपमान से नहीं, श्रद्धा से याद करते हैं स्थानीय लोग

देवघर के तीर्थ पुरोहितों और स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच रावण को लेकर एक विशिष्ट भाव देखने को मिलता है। उनके लिए रावण केवल रामायण का प्रतिपक्षी पात्र नहीं, बल्कि भगवान शिव का महान भक्त भी है।

स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिस रावण की तपस्या से बाबा बैद्यनाथ की महिमा इस क्षेत्र से जुड़ी, उसे अपमानित करना उचित नहीं माना जाता। इसी वजह से रावण के प्रति सम्मान व्यक्त करने की परंपरा का उल्लेख किया जाता है।

स्थानीय तीर्थ पुरोहित रावण की शिवभक्ति को याद करते हुए भजन भी गाते हैं। भजन की पंक्तियों में रावण को धन्यवाद देते हुए बाबा भोलेनाथ को देवघर लाने के लिए उनकी महिमा का गुणगान भी किया जाता है।

यह लोक आस्था बताती है कि देवघर में रावण की स्मृति का एक अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष भी है। बाबा बैद्यनाथ धाम की यह कथा आस्था, पौराणिक परंपरा और स्थानीय संस्कृति का अनूठा संगम है।

यहां रावण की चर्चा उसके अहंकार या युद्ध तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसकी तपस्या, विद्वता और शिवभक्ति के संदर्भ में भी होती है।

यही देवघर की उस धार्मिक परंपरा की विशेषता है, जिसमें बाबा बैद्यनाथ के प्रति अटूट श्रद्धा के साथ उनके धाम से जुड़ी पौराणिक कथाओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा गया है।

इसलिए यहां पर रावण का पुतला दहन दशहरे के दिन नहीं किया जाता है। हालांकि, देवघर जिले के मधुपुर शहर में रावण का पुतला दहन होता है।

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