चतरा में यहां 250 साल पहले जैसी पूजा, आज भी: कलश स्थापना के लिए राजगढ़ से एक पैर पर मिट्टी लाते पुजारी, कंधे पर विदाई
चतरा के इटखोरी स्थित टाल पर लगभग 250 साल पुरानी दुर्गा पूजा की ऐतिहासिक परंपरा आज भी जीवंत है, जिसकी ...और पढ़ें

कलश स्थापना के लिए राजगढ़ से एक पैर पर मिट्टी लाने की अनूठी विधि अपनाई जाती है।
HighLights
इटखोरी के टाल पर 250 साल पुरानी दुर्गा पूजा परंपरा।
राजा हरि नारायण सिंह ने की थी ऐतिहासिक पूजा की शुरुआत।
कलश स्थापना हेतु राजगढ़ से एक पैर पर मिट्टी लाने की अनूठी विधि।
पंकज कुमार सिंह, इटखोरी (चतरा)। इटखोरी के टाल पर की राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही दुर्गा पूजा की ऐतिहासिक परंपरा आज भी जीवंत है। लगभग ढाई सौ साल पहले इस ऐतिहासिक पूजा की शुरुआत इटखोरी टाल के राजा हरि नारायण सिंह ने की थी।
तब से यह सुचारू रूप से यहां होती आ रही है। वर्तमान में इटखोरी के ग्रामीण इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। लगभग ढाई सौ साल पहले टाल पर दुर्गा पूजा का आयोजन शुरू होने के बाद धीरे-धीरे पितीज, गुल्ली, करनी, परसौनी, परोका और इटखोरी बाजार में भी दुर्गा पूजा का आयोजन होने लगा।
हालांकि अन्य जगहों पर पूजा शुरू होने के बावजूद टाल की दुर्गा पूजा से प्रखंड के लोगों की श्रद्धा और आस्था आज भी गहराई से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि नवरात्र के पावन अवसर पर प्रखंड के अधिकांश गांवों के लोग टाल पर विराजमान मां दुर्गा का दर्शन करने आवश्यक रूप से आते हैं।
पूर्व में यहां राजा की ओर से बलि प्रथा के साथ पूजा की जाती थी, लेकिन वर्ष 1920 के बाद से मंदिर में वैष्णवी पूजा आरंभ हो गई। पुरानी परंपरा को कायम रखने के लिए नवमी के दिन भैंसे के स्थान पर गन्ने और भुआ कोहड़े की बलि दी जाने लगी। पूजा संपन्न होने के बाद दशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा को वाहन पर ले जाने के बजाय श्रद्धालु अपने कंधे पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाते हैं।
कलश स्थापना के लिए पुजारी राजगढ़ से एक पैर पर लाते हैं मिट्टी
इस ऐतिहासिक पूजा की एक खास बात नवरात्र के पहले दिन की कलश स्थापना विधि है। कलश स्थापना से पूर्व आज भी राजा हरि नारायण सिंह के राजगढ़ से पारंपरिक रूप से मिट्टी लाई जाती है। पुजारी यहां से एक पैर पर मिट्टी ले जाते हैं।
जिसके बाद ही कलश स्थापना की विधि संपन्न होती है। इटखोरी टाल के राजा ने इस दुर्गा मंडप को गांव के समीप एक ऊंचे टीले पर स्थापित किया था। ऊंचे स्थान पर होने के कारण वहां का वातावरण काफी खुशनुमा रहता है।
यहां कलश स्थापना के दिन से ही सुबह नवरात्र कथा और रात में महाआरती शुरू हो जाती है। आरती में सैकड़ों लोग जमा होकर भाग लेते हैं और महिलाएं देर रात तक देवी मां के गीत गाती हैं। इटखोरी टाल को ऐतिहासिक पूजा स्थल होने का गौरव प्राप्त है।
कंधे पर मां की प्रतिमा का होता है विसर्जन
टाल की दुर्गा पूजा में प्रतिमा विसर्जन की परंपरा भी अलग है। पूजा संपन्न होने के बाद दशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा को वाहन पर ले जाने के बजाय श्रद्धालु अपने कंधे पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाते हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु शामिल होते हैं।
ढोल-नगाड़े और जयकारों के बीच मां को विदाई दी जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों पुरानी इस परंपरा को आज भी उसी तरह निभाया जा रहा है।
टाल की दुर्गा पूजा करीब ढाई सौ साल पुरानी है। एक पैर पर मिट्टी लाने से लेकर कंधे पर मां की प्रतिमा के विसर्जन तक कई परंपराएं आज भी कायम हैं। गांव के लोग मिलकर इन परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं।
-अरविंद गिरी, पूजा समिति अध्यक्ष।
