कहां गया अमरनाथ यात्रा 2026 का 300 मीट्रिक टन कचरा, कैसे काम करता है मॉडल 'स्वाहा'?
श्री अमरनाथ यात्रा 2024 में रिकॉर्ड 4.5 लाख से अधिक तीर्थयात्रियों के बावजूद, यह यात्रा पर्यावरण के अनुकूल कचरा प्रबंधन का बेहतरीन उदाहरण बनी है। ...और पढ़ें
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300 मीट्रिक टन कचरे का हुआ निपटान। फोटो जागरण
HighLights
रिकॉर्ड 4.5 लाख तीर्थयात्रियों के साथ भी यात्रा स्वच्छ रही।
300 मीट्रिक टन कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निपटान किया गया।
"स्वाहा" स्टार्टअप ने अपशिष्ट प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जागरण संवाददाता, श्रीनगर। श्री अमरनाथ जी की वार्षिक यात्रा बालाटाल व पहलगाम, दोनों यात्रा मार्गों से सुचारु ढंग से जारी है। वर्ष 2011 व 2024 में इस तीर्थ यात्रा में भाग लेने वाले रिकॉर्ड तीर्थयात्रियों के बाद अब 3 जुलाई से शुरू हुई 57 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा जोकि अब अपने आखिरी चरण में है, में 30 जुलाई तक साढ़े चार लाख से अधिक तीर्थयात्रियों की रिकॉर्ड संख्या के बावजूद यह यात्रा पर्यावरण के अनुकूल कचरा प्रबंधन का एक बेहतरीन उदाहरण बनकर उभरी है।
30 जुलाई तक लगभग 300 मीट्रिक टन सॉलिड वेस्ट इकट्ठा किया गया और वैज्ञानिक तरीके से उसका निपटान किया गया। यह नाजुक हिमालयी इलाके में सरकार की 'ग्रीन पहल' की सफलता को दिखाता है।
इस वार्षिक यात्रा को श्रद्धालुओं से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है। भारी भीड़ के बावजूद, सफाई अधिकारियों ने यात्रा मार्गों पर सफाई का शानदार रिकॉर्ड बनाए रखा है, जिससे यह यात्रा आध्यात्मिक रूप से समृद्ध और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनी हुई है।

वैज्ञानिक तरीकों से कचरे का किया जा रहा निपटान
यात्रा के दौरान मार्गों पर जमा हो रहे कचरे को वैज्ञानिक तरीकों से निपटान किया जा रहा है। आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि 30 जुलाई तक 291.72 मीट्रिक टन सॉलिड वेस्ट इकट्ठा किया गया और वैज्ञानिक तरीके से उसका निपटान किया गया, जिससे इस साल की यात्रा हाल के वर्षों की सबसे स्वच्छ और पर्यावरण के लिहाज से सबसे बेहतर ढंग से प्रबंधित यात्राओं में से एक बन गई है।
आंकड़ों के अनुसार, बालटाल रूट पर 191.29 मीट्रिक टन और पहलगाम रूट पर 100.43 मीट्रिक कचरा इकट्ठा किया गया है। सिर्फ 30 जुलाई को सफाई कर्मचारियों ने बालटाल से 7.7 मीट्रिक और पहलगाम से 1.3 मीटरिक टन कचरा इकट्ठा किया।
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रोज़ाना तीर्थयात्रियों की भारी भीड़ के बावजूद, उन्होंने कचरे को तुरंत इकट्ठा करने और वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस करने का काम किया। ये आंकड़े सफ़ाई व्यवस्था के लिए लोगों की ज़बरदस्त तारीफ़ भी दिखाते हैं।

तीर्थयात्री स्वच्छा व सुविधाओं से संतुष्ठ
इस तीर्थ यात्रा में भाग ले रहे श्रद्धालु इनके लिए उपलबध रखी गई आवश्यक सुविधाओं व स्वच्छा के प्रबंधों से संतुष्ट हैं। यात्रा मोबाइल ऐप वेबसाइट और डिजिटल कियोस्क के ज़रिए अभी तक श्रद्धालुओं के 34,266 फ़ीडबैक मिले हैं। जिनमें से 98 प्रतिशत से ज़्यादा तीर्थयात्रियों ने दोनों यात्रा रूट पर शौचालय की सुविधाओं और कुल सफ़ाई को अच्छा बताया।
हालांकि, अधिकारियों ने कहा कि जो कुछ शिकायतें मिलीं, वे मुख्य रूप से कुछ टॉयलेट जगहों पर पानी की सप्लाई और बिजली की समस्याओं से जुड़ी थीं। बजोय आनंद नामक पश्चिम बंगाल के एक तीर्थ यात्री ने कहा, मैंने पहलगाम रूट से पवित्र गुफा के दर्शन किए। बालाटाल रूट से वापसी हुई। दोनों यात्रा मार्गों पर महारे लिए बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध रखी गई हैं। हमें किसी प्रकार की कोई दिक्कत नही हुई।
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पर्यावरण को स्वच्छ रखने में तीर्थायत्रियों ने भी निभाई अपनी भूमिका
प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे इन्फार्मेशन, एजुकेशन और कम्युनिकेशन (आईईसी) अभियान में भी तीर्थयात्रियों की अच्छी भागीदारी देखी गई है। एक संबंधित अधिकारी ने कहा, 11,048 तीर्थयात्रियों ने पर्यावरण बचाने का संकल्प लिया है, जबकि 7,200 लोगों को ज़िम्मेदार यात्री सर्टिफ़िकेट'' दिए गए हैं, जिन्होंने हिमालय के नाज़ुक इकोसिस्टम की रक्षा करने का वादा किया है।
प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए, ग्रामीण सफ़ाई विभाग ने तीर्थयात्रियों के बीच 1,10,200 दोबारा इस्तेमाल होने वाले बैग बांटे हैं। उन्होंने कहा, बर्तन बैंक'' पहल के तहत दोबारा इस्तेमाल होने वाली बर्तन किट बांटी गईं, जिनमें से 94 वापस आ गई हैं, जबकि ''सेवा कैफ़े'' पहल ने भी 200 दोबारा इस्तेमाल होने वाले बैग बांटे हैं।
इन पहलों का मकसद सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को रोकना और ज़िम्मेदार तरीके से यात्रा करने को बढ़ावा देना है। अधिकारी ने कहा, सफ़ाई अभियान की एक खास बात यह रही कि दुर्गम पहाड़ी इलाकों से कचरा लाने के लिए बड़े पैमाने पर घोड़ों का इस्तेमाल किया गया।
बालटाल रूट पर काम करने वाले लगभग 1000 घोड़ों ने करीब 46 मीट्रिक टन कचरा नीचे पहुंचाया, जबकि पहलगाम रूट पर 590 घोड़ों ने 34 मीट्रिक टन कचरा पहुंचाया। इस तरह घोड़ों के ज़रिए कुल मिलाकर लगभग 80 मीट्रिक टन कचरा हटाया गया।

300 मीट्रिक टन ठोस कचरे को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस किया
यात्रा के दौरान ठोस और तरल कचरे को वैज्ञानिक तरीके से इकट्ठा करने और प्रोसेस करने की ज़िम्मेदारी संभालने वाले स्टार्टअप ''स्वाहा'' के सीईओ डा. समीर शर्मा ने कहा कि ये आंकड़े आपरेशन के बड़े पैमाने और मिलकर किए गए प्रयासों की सफलता को दिखाते हैं।
आंकड़े खुद सब कुछ बयां करते हैं। उन्होंने कहा, 30 जुलाई तक लगभग 4.5 लाख तीर्थयात्रियों की रिकॉर्ड संख्या के बावजूद, हमने यात्रा के दौरान पैदा हुए लगभग 300 मीट्रिक टन ठोस कचरे को वैज्ञानिक तरीके से इकट्ठा और प्रोसेस किया है।
हमारी टीमें चौबीसों घंटे काम कर रही हैं ताकि यह पक्का किया जा सके कि कोई भी कचरा बिना निपटान के न छूटे और हिमालय का नाजुक इकोसिस्टम सुरक्षित रहे, डा. शर्मा ने बताया।
वैज्ञानिक सिस्टम के जरिए तरल कचरे का भी ट्रीटमेंट
उन्होंने कहा कि ''स्वाहा'' का इंटीग्रेटेड वेस्ट मैनेजमेंट मॉडल ठोस और तरल दोनों तरह के कचरे को कवर करता है, जिससे पूरी तीर्थयात्रा के दौरान वैज्ञानिक तरीके से कचरा इकट्ठा करने, उसे ले जाने, अलग-अलग करने, प्रोसेस करने और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से निपटाने का काम होता है।
उन्होंने कहा, यह सिर्फ कचरा इकट्ठा करने के बारे में नहीं है; यह तीर्थयात्रा का एक टिकाऊ मॉडल बनाने के बारे में है। ठोस कचरे के मैनेजमेंट के साथ-साथ, हम वैज्ञानिक सिस्टम के जरिए तरल कचरे का भी ट्रीटमेंट कर रहे हैं।
उन्होने कहा कि लोगों का जबरदस्त सहयोग, जिसमें सफाई को लेकर 98 प्रतिशत से ज़्यादा पॉजिटिव फीडबैक मिला है, ग्रामीण स्वच्छता विभाग, सफाई कर्मचारियों, वालंटियर्स, टट्टू संचालकों और हमारी फील्ड टीमों की मिली-जुली कोशिशों को दिखाता है।
पर्यावरण को बचाने में सक्रिय भागीदार
डॉ. शर्मा ने कहा कि ''रिस्पॉन्सिबल यात्री'' कैंपेन, दोबारा इस्तेमाल होने वाले बैग बांटने, बर्तन बैंक और लगातार जागरूकता कार्यक्रमों जैसी पहलों ने प्लास्टिक कचरे को काफी कम किया है और तीर्थयात्रियों को हिमालय के पर्यावरण को बचाने में सक्रिय भागीदार बनने के लिए प्रोत्साहित किया है।
अधिकारियों ने कहा कि ग्रामीण स्वच्छता विभाग, 'स्वाहा', सफाई कर्मचारियों, वालंटियर्स, टट्टू संचालकों और अन्य संबंधित लोगों की मिली-जुली कोशिशों ने इस वर्ष की अमरनाथ यात्रा को पर्यावरण के अनुकूल तीर्थयात्रा मैनेजमेंट का एक राष्ट्रीय मॉडल बना दिया है। इससे यह साबित होता है कि हिमालय के शुद्ध इकोसिस्टम को बचाते हुए तीर्थयात्रियों की रिकॉर्ड संख्या को भी मैनेज किया जा सकता है।