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क्या बदल रही है कश्मीर की सियासी भाषा? 'वंदे मातरम्' पर खड़ा हुआ पूरा सभागार, उमर-फारूक भी रहे मौजूद

By Naveen NawazEdited By: Dallu Slathia
Published: Tue, 08 Sep 2026 04:25 PM (IST)Updated: Tue, 08 Sep 2026 11:13 PM (IST)

श्रीनगर में पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में 'वंदे मातरम्' पर पूरा सभागार खड़ा हुआ, जो घाटी में बदलते राजनीतिक मिजाज ...और पढ़ें

IFFJK उद्घाटन पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और डॉ. फारूक अब्दुल्ला। (फोटो- साहिल मीर/जागरण)

IFFJK उद्घाटन पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और डॉ. फारूक अब्दुल्ला। (फोटो- साहिल मीर/जागरण)

HighLights

  1. श्रीनगर फिल्म महोत्सव में 'वंदे मातरम्' पर खड़ा हुआ सभागार।

  2. उमर और फारूक अब्दुल्ला की उपस्थिति ने दिया राजनीतिक महत्व।

  3. सिनेमा के माध्यम से कश्मीर में सामान्यीकरण और विकास का प्रयास।

नवीन नवाज, श्रीनगर। श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में सोमवार शाम जम्मू-कश्मीर के पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के उद्घाटन का दृश्य केवल एक सांस्कृतिक आयोजन का दृश्य नहीं था। फिल्म महोत्सव के उद्घाटन के दौरान जब ‘वंदे मातरम्’ का पूरा गायन हुआ तो पूरा सभागार सम्मान में खड़ा हो गया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कान्फ्रेंस के अध्यक्ष डा फारूक अब्दुल्ला भी पूरे समय खड़े रहे। इसके बाद राष्ट्रगान हुआ।

मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में यह दृश्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘वंदे मातरम्’ यहां केवल राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि लंबे समय से धर्म, राष्ट्रवाद, कश्मीरी पहचान और राजनीतिक अस्मिता से जुड़े सवालों का हिस्सा रहा है। ऐसे में एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के मंच पर उमर और फारूक अब्दुल्ला का पूरे गीत के दौरान खड़ा होना बदलते सार्वजनिक और राजनीतिक माहौल का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।

15 अगस्त से शुरू हुआ नया सार्वजनिक प्रयोग

इस दृश्य की पृष्ठभूमि 15 अगस्त के स्वतंत्रता दिवस समारोह से भी जुड़ती है। 2026 के स्वतंत्रता दिवस समारोह में श्रीनगर के बख्शी स्टेडियम में राष्ट्रगान के साथ ‘वंदे मातरम्’ भी प्रस्तुत किया गया। जम्मू-कश्मीर में आधिकारिक कार्यक्रमों में इसके इस्तेमाल को लेकर इसी वर्ष एक नया प्रयोग शुरू हुआ।

15 अगस्त के बाद 17 अगस्त को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि लोग इस व्यवस्था के अभ्यस्त होने में कुछ समय ले सकते हैं। उन्होंने बताया कि बतौर मुख्यमंत्री जिस स्वतंत्रता दिवस परेड में वह आठवीं बार शामिल हुए, वहां पहली बार ‘वंदे मातरम्’ बजाया गया था। उन्होंने इस पर उठे विवाद को अनावश्यक बताते हुए कहा कि इस वर्ष इसे आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल किया गया है।

इसलिए सोमवार को फिल्म महोत्सव में पूरा ‘वंदे मातरम्’ बजने और अब्दुल्ला परिवार के खड़े रहने को 15 अगस्त से शुरू हुए इसी व्यापक बदलाव की अगली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।

वंदे मातरम् पर उमर का रुख क्यों महत्वपूर्ण है?

उमर अब्दुल्ला का मौजूदा रुख इसलिए खास है क्योंकि नेशनल कान्फ्रेंस की राजनीति लंबे समय से कश्मीरी पहचान, स्वायत्तता और भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक संबंधों के सवालों के बीच अपना संतुलन तलाशती रही है।

उमर ने हालिया विवाद में यह रेखांकित करने की कोशिश की कि ‘वंदे मातरम्’ को सरकारी कार्यक्रमों में शामिल करना नया है और लोगों को इसे स्वीकार करने में समय लग सकता है। यह बयान किसी आक्रामक राष्ट्रवादी राजनीतिक भाषा के बजाय क्रमिक बदलाव की भाषा है।

यही वजह है कि श्रीनगर के अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में उनका पूरे गीत के दौरान खड़ा रहना केवल व्यक्तिगत शिष्टाचार का मामला नहीं माना जा रहा। इसे नेशनल कान्फ्रेंस की उस राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है, जिसमें वह एक ओर राज्य के दर्जे की बहाली और कश्मीर की राजनीतिक पहचान की मांग कर रही है और दूसरी ओर राष्ट्रीय संस्थाओं व प्रतीकों से दूरी बनाने की बजाय उनके साथ अपना संबंध बनाए रखना चाहती है।

लेकिन कश्मीर में वंदे मातरम् का विरोध नया नहीं

कश्मीर में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर असहमति को केवल मौजूदा राजनीति से जोड़कर देखना इतिहास को अधूरा देखना होगा। इस गीत को लेकर मुस्लिम समाज के एक हिस्से की धार्मिक आपत्ति स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से चली आ रही है।

इसके शुरुआती दो अंतरों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और उसके प्रति सम्मान का भाव है, लेकिन बाद के अंतरों में दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं से जुड़े धार्मिक बिंब आते हैं। इसी वजह से मुस्लिम नेताओं के एक वर्ग ने इसे धार्मिक आस्था के साथ टकराव वाला माना।

कश्मीर के मुस्लिम धार्मिक संगठनों की आपत्ति

कश्मीर में इस मुद्दे पर हाल के वर्षों में सबसे मुखर विरोध मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा की ओर से आया है। नवंबर 2025 में जम्मू-कश्मीर के स्कूलों में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करने के सरकारी निर्देश पर इस संगठन ने आपत्ति जताई थी।मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले इस संगठन ने कहा था कि गीत के कुछ अंशों में भक्ति और धार्मिक समर्पण की ऐसी अभिव्यक्तियां हैं, जिन्हें इस्लाम के एकेश्वरवाद यानी तौहीद की अवधारणा के साथ संगत नहीं माना जा सकता।

संगठन ने विशेष रूप से छात्रों और शिक्षकों की अनिवार्य भागीदारी पर सवाल उठाया था। दिसंबर 2025 में भी मुत्तहिदा मजलिस ए उलेगाम ने ‘वंदे मातरम्’ आधारित गायन प्रतियोगिता के प्रचार पर धार्मिक आपत्ति दर्ज कराई थी।

संगठन का कहना था कि गैर-इस्लामी धार्मिक अर्थ वाले प्रतीकों या गीतों में भाग लेना मुस्लिमों के लिए शरीयत संबंधी सवाल पैदा करता है। , वहीं भाजपा नेताओं ने इसका विरोध करने वालों पर राष्ट्रवाद को धार्मिक रंग देने का आरोप लगाया। जम्मू-कश्मीर भाजपा के नेताओं ने ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताते हुए इसके विरोध की आलोचना की।

कश्मीर की पृष्ठभूमि में इसका महत्व

कश्मीर घाटी की राजनीति को समझे बिना इस बदलाव का अर्थ पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। 1930 के दशक में कश्मीरी मुस्लिम राजनीति के अधिकारों की मांग से लेकर नेशनल कान्फ्रेंस के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक रूपांतरण तक, घाटी की राजनीति ने कई चरण देखे हैं।

1932 में शेख अब्दुल्ला और चौधरी गुलाम अब्बास के नेतृत्व में मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन हुआ था। बाद में शेख अब्दुल्ला ने इसे व्यापक कश्मीरी राजनीतिक मंच

1947 के बाद भारत-पाकिस्तान विवाद, 1980-90 के दशक का आतंकवाद, अलगाववाद, कश्मीरी पंडितों का विस्थापन और लंबे समय तक चली हिंसा ने घाटी की सार्वजनिक राजनीति को गहरे प्रभावित किया। 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रमुख प्रावधानों के निरसन और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद राज्य का दर्जा, राजनीतिक अधिकार और केंद्र-प्रदेश संबंध फिर सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हो गए।

इसी पृष्ठभूमि में ‘वंदे मातरम्’ जैसे राष्ट्रीय प्रतीक का सार्वजनिक रूप से सम्मान करना और साथ ही राज्य के दर्जे की बहाली की मांग करना जम्मू-कश्मीर की मौजूदा राजनीति के जटिल संतुलन को दिखाता है।

लाल चौक से एसकेआईसीसी तक

कुछ दिन पहले श्रीनगर की सड़कों पर भाजपा और नेशनल कान्फ्रेंस के बीच राजनीतिक टकराव दिखाई दे रहा था। भाजपा बेरोजगारी, विकास और सरकार के कथित अधूरे वादों को लेकर प्रदर्शन कर रही थी, जबकि नेशनल कान्फ्रेंस ने इसका राजनीतिक जवाब देने की तैयारी की। अब उसी श्रीनगर में देश-विदेश से फिल्मकार जुटे हैं और एक सभागार ‘वंदे मातरम्’ के दौरान खड़ा दिखाई दिया।

ये दोनों तस्वीरें विरोधाभासी नहीं, बल्कि आज के कश्मीर की एक साथ मौजूद दो वास्तविकताओं को सामने रखती हैं—एक ओर राज्य के दर्जे, अधिकारों और राजनीतिक पहचान के सवाल हैं; दूसरी ओर सामान्य जीवन, पर्यटन, रोजगार, संस्कृति और देश-दुनिया से जुड़ने की आकांक्षा है।

एक बात स्पष्ट है—राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर कश्मीर की सार्वजनिक भाषा में कुछ बदलाव दिखाई दे रहा है। 15 अगस्त के समारोह से लेकर अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव तक ‘वंदे मातरम्’ अब घाटी के सार्वजनिक मंचों पर पहले की तुलना में अधिक स्पष्टता से दिखाई दे रहा है।

उमर और फारूक अब्दुल्ला का पूरे गीत के दौरान खड़ा होना इसी बदलाव का प्रतीकात्मक दृश्य है। यह न तो कश्मीर के सभी राजनीतिक सवालों का समाधान है और न ही पूरी घाटी की मानसिकता में परिवर्तन का प्रमाण। लेकिन यह जरूर बताता है कि कश्मीर अपनी कश्मीरी पहचान, राजनीतिक अधिकारों और भारतीय राष्ट्रीय विमर्श के बीच एक नया संतुलन तलाश रहा है।

और शायद इसीलिए श्रीनगर के एसकेआईसीसी का सोमवार का दृश्य केवल ‘वंदे मातरम्’ पर खड़े हुए लोगों का दृश्य नहीं था। यह संघर्ष की पुरानी सुर्खियों से आगे बढ़कर कश्मीर के अपने भविष्य की कहानी खुद कहने की कोशिश का भी दृश्य था।