कश्मीर में क्लाइमेट चेंज का असर! नए इलाकों में बढ़ीं बादल फटने की घटनाएं, कुलगाम-शोपियां-बारामूला बने नए हॉटस्पॉट
कश्मीर में बादल फटने की घटनाओं में तेजी आई है, कुलगाम, शोपियां और बारामूला नए हॉटस्पॉट बनकर उभरे हैं। ...और पढ़ें

कश्मीर में जलवायु परिवर्तन का कहर कुलगाम शोपियां बारामूला बने बादल फटने के नए केंद्र। फाईल फोटो।
HighLights
कुलगाम, शोपियां, बारामूला में बादल फटने की घटनाएं तेजी से बढ़ीं।
जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिक गिरावट और अनियोजित विकास प्रमुख कारण।
इस साल 40 घटनाओं में 34 लोगों की जान गई, भारी नुकसान।
जागरण संवाददाता, श्रीनगर। दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम, शोपियां और उत्तरी कश्मीर का बारामूला। चंद बरस पहले तक इन तीन जिलों का नाम आते ही जेहन में अशांति और हिंसा की तस्वीरें उभरती थीं। लेकिन अब इन जिलों की पहचान बदल रही है, और यह बदलाव डराने वाला है।
ये जिले अब घाटी में बादल फटने के सबसे नए और खतरनाक हॉटस्पॉट बनकर उभर रहे हैं। बीते दिनों इन जिलों, खासकर कुलगाम और शोपियां में बादल फटने की लगातार घटनाओं ने आम लोगों के साथ-साथ वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल दिया है।
आधिकारिक आंकड़े इस नई आफत की गंभीरता को बयां करते हैं। इस साल सिर्फ 1 जून से अब तक पूरे जम्मू-कश्मीर में बादल फटने की 40 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन घटनाओं में 34 बेगुनाह लोगों की जान चली गई है, जबकि सैकड़ों घर, सड़कें, पुल और खेती की उपजाऊ जमीन तबाह हो गई है।
अब कोई भी जिला सेफ जोन नहीं
पहले तक डोडा, किश्तवाड़ और रामबन जैसे पहाड़ी जिलों को ही बादल फटने के लिहाज से सबसे ज्यादा कमजोर माना जाता था। इन इलाकों में ऐसी आपदाएं आम थीं। लेकिन इस साल तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। दक्षिण और उत्तरी कश्मीर के उन इलाकों में तबाही हो रही है, जिन्हें पहले तुलनात्मक रूप से कम खतरे वाला माना जाता था।
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हाल के हफ्तों में कुलगाम के नंदीमार्ग, शोपियां के पेहरीपोरा और बारामूला के उरी में बादल फटने की दिल दहला देने वाली घटनाएं हुई हैं। इसके अलावा केंद्र शासित प्रदेश के कई अन्य हिस्सों से भी ऐसी ही खबरें आई हैं। आपदा के इस बदलते ज्योग्राफिकल फैलाव ने वैज्ञानिकों और डिजास्टर मैनेजमेंट एक्सपर्ट्स के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। उनका साफ कहना है कि खराब मौसम की घटनाएं अब ज्यादा बार हो रही हैं और उनका पहले से अंदाजा लगाना भी दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।
गर्म होती हवा में छिपी है तबाही की वजह
आखिर क्यों कश्मीर में इतनी तेजी से बादल फट रहे हैं? पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. तौसीफ अहमद भट इसके पीछे सीधा क्लाइमेट चेंज का हाथ बताते हैं।
डॉ. भट कहते हैं, 'बादल फटने की बढ़ती संख्या तेजी से गर्म हो रहे एटमॉस्फियर के असर को दिखाती है। गर्म हवा में काफी ज्यादा नमी मौजूद होती है। जब वह नमी भरी हवा पहाड़ी इलाकों से टकराती है और ऊपर उठती है, तो वह अचानक ठंडी होकर बहुत कम समय में बहुत तेज बारिश के रूप में बरसती है, जिससे अचानक बाढ़ और बादल फटने जैसी घटनाएं होती हैं। कश्मीर में मौसम में बदलाव के निशान पहले से कहीं ज्यादा साफ दिख रहे हैं।'
वे चेतावनी देते हुए कहते हैं कि कुलगाम, शोपियां और बारामूला जैसे जिलों में बादल फटने का बढ़ता पैटर्न इस बात का सबूत है कि घाटी का कोई भी हिस्सा अब ऐसी घटनाओं से बचा हुआ नहीं माना जा सकता।
डॉ. भट ने जोर देकर कहा, 'हमें बादल फटने को अलग-थलग आपदा मानने से आगे बढ़ना होगा। वे बदलते क्लाइमेट की सच्चाई का हिस्सा बन रहे हैं, जिसके लिए बेहतर फोरकास्टिंग सिस्टम, साइंटिफिक हैज़र्ड मैपिंग और मजबूत कम्युनिटी तैयारी की सख्त जरूरत है।'
कुदरत से छेड़छाड़ पड़ी भारी
एक अन्य जाने-माने पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. शकील रोमशू इस तबाही के लिए सिर्फ क्लाइमेट चेंज को ही जिम्मेदार नहीं मानते। उनके मुताबिक, इकोलॉजिकल गिरावट और बिना प्लान के हो रहा डेवलपमेंट इस आग में घी का काम कर रहा है।
डॉ. रोमशू कहते हैं, 'हमारे नाजुक पहाड़ी इकोसिस्टम सिकुड़ते जंगलों, नेचुरल ड्रेनेज चैनलों पर कब्जे और बिना रोक-टोक के कंस्ट्रक्शन की वजह से बेहद कमजोर हो गए हैं। क्लाइमेट चेंज बारिश को तेज कर रहा है, लेकिन मानव हस्तक्षेप इसके नुकसानदायक प्रभाव को कई गुना बढ़ा रहा है।'
उन्होंने जोर देकर कहा कि जंगलों, वेटलैंड्स और कुदरती पानी के रास्तों की सुरक्षा को आपदा कम करने की रणनीतियों का एक अहम हिस्सा बनना ही होगा। 'अगर हम कुदरती नजारों को इसी तरह परेशान करते रहेंगे तो आपदाओं की तीव्रता और बढ़ेगी। इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन को क्लाइमेट अडॉप्टेशन के साथ-साथ चलना ही चाहिए।'
पहले से ज्यादा अस्थिर हुई घाटी की हवा
स्वतंत्र मौसम विशेषज्ञ फैजान आरिफ केंग भी इस बदलाव को करीब से देख रहे हैं। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों में जम्मू और कश्मीर में मौसम के पैटर्न में काफी बड़ा बदलाव आया है।
आरिफ ने बताया, 'गर्मियों के महीनों में वातावरण बहुत ज्यादा अस्थिर हो गया है। नमी का ज्यादा आना, लगातार बढ़ता तापमान और स्थानीय तलरूप तेज बारिश की घटनाओं के लिए बिल्कुल सही हालात बना रहे हैं। जिन जगहों पर बादल फटने की घटनाएं बहुत कम होती थीं, वहां अब ये ज्यादा बार हो रही हैं।'
उन्होंने कहा कि बेहतर वेदर मॉनिटरिंग, समय पर पब्लिक एडवाइजरी और कम्युनिटी लेवल पर ज्यादा जागरूकता ही भविष्य में होने वाली खराब मौसम की घटनाओं के दौरान जान के नुकसान को कम कर सकती है।
पॉलिसी में बड़े बदलाव की दरकार
सभी विशेषज्ञों का एक ही सुर में कहना है कि यह नया ट्रेंड आपदा मैनेजमेंट पॉलिसी में तुरंत बदलाव की मांग करता है। अब सिर्फ राहत और बचाव से काम नहीं चलेगा। सरकार को क्लाइमेट रेजिलिएंस, अर्ली वार्निंग सिस्टम, वाटरशेड मैनेजमेंट और कमजोर जोन में कंस्ट्रक्शन को रेगुलेट करने पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
उन्होंने चेतावनी दी है कि जैसे-जैसे हिमालय में क्लाइमेट चेंज तेजी से बढ़ रहा है, वैसे-वैसे घाटी के ये नए बादल फटने वाले हॉटस्पॉट भविष्य की एक डरावनी झलक दिखा सकते हैं, जहां बहुत ज्यादा खराब मौसम अपवाद के बजाय एक आम बात हो जाएगी।