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कश्मीरी हस्तशिल्प में धोखाधड़ी पर लगेगी लगाम, प्रामाणिकता के लिए लॉन्च हुआ QR कोड मैनेजमेंट सिस्टम

Published: Sun, 23 Aug 2026 12:35 PM (IST)

कश्मीर के हस्तशिल्प और हथकरघा विभाग ने असली और नकली उत्पादों में फर्क करने के लिए एक अत्याधुनिक जीआई क्यूआर कोड मैनेजमेंट सिस्टम लॉन्च किया है।

असली कश्मीरी हुनर पर अब डिजिटल मुहर (प्रतीकात्मक फोटो)

असली कश्मीरी हुनर पर अब डिजिटल मुहर (प्रतीकात्मक फोटो)

HighLights

  1. कश्मीरी हस्तशिल्प के लिए अत्याधुनिक जीआई क्यूआर कोड मैनेजमेंट सिस्टम लॉन्च।

  2. नकली उत्पादों पर लगेगी लगाम, असली कारीगरों को मिलेगा लाभ।

  3. लुप्त हो रहे पारंपरिक शिल्पों को नई पहचान और बाजार मूल्य।

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। अगर आपने कभी कश्मीरी हस्तशिल्प खरीदा है और मन में ये सवाल आया है कि ये असली है या नकली, तो अब इस परेशानी का हल निकल आया है। कश्मीर के सदियों पुराने हुनर को बचाने और दुनिया के बाजार में उसकी असली पहचान दिलाने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाया गया है।

हस्तशिल्प और हथकरघा विभाग, कश्मीर ने श्रीनगर स्थित क्वालिटी कंट्रोल डिवीजन (क्यूसीडी) में अत्याधुनिक भौगोलिक संकेतक क्यूआर कोड मैनेजमेंट सिस्टम लांच किया है। इस सिस्टम का मकसद सिर्फ एक लेबल लगाना नहीं, बल्कि कश्मीर के हर धागे, हर लकड़ी व हर बुनाई में बसी आत्मा को एक डिजिटल पहचान देना है।

क्या है ये पूरा सिस्टम और कैसे करेगा काम?

अब तक आपने कश्मीर पश्मीना या कालीन पर जीआई टैग देखा होगा, लेकिन अब छोटे और लुप्त हो रहे शिल्पों को भी यही सम्मान मिलेगा। क्यूसीडी लैब में अब हर प्रमाणित प्रोडक्ट पर एक खास क्यूआर कोड वाला लेबल लगाया जाएगा।

ग्राहक को बस अपने मोबाइल से इस क्यूआर कोड को स्कैन करना होगा और तुरंत पता चल जाएगा - ये प्रोडक्ट कहाँ बना, किस कारीगर ने बनाया, कौन सी सामग्री इस्तेमाल हुई और क्या ये सच में सरकार द्वारा प्रमाणित जीआई प्रोडक्ट है। मतलब, नकली माल बेचने वालों की अब खैर नहीं और असली कारीगर के हुनर की कीमत दुनिया समझेगी।

अब कारीगरों को नहीं होगी परेशानी

इस नई पहल के साथ ही क्यूसीडी लैब अब जम्मू-कश्मीर की तीसरी जीआई प्रयोगशाला बन गई है। इससे पहले एनएबीएल-मान्यता प्राप्त आइआइसीटी और पीटीक्यूसीसी प्रयोगशालाएं ही ये काम कर रही थीं। अब कारीगरों को अपना सामान टेस्ट करवाने के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

नई अपग्रेडेड लैब में जिन-जिन उत्पादों की जांच और जीआई लेबलिंग होगी उनमें वाग्गूव, गाबा, नमदा, अखरोट की लकड़ी की नक्काशी, चेन स्टिच, खतमबंद, क्रूल शामिल हैं। ये वो शिल्प हैं जो कभी हर कश्मीरी घर की शान होते थे, लेकिन मशीनों और नकली उत्पादों की भीड़ में कहीं खो से गए थे।

लुप्त हो रहे शिल्पों को मिलेगा नया जीवन

विभाग ने साफ कहा है कि इस योजना का सबसे बड़ा फोकस उन शिल्पों पर है जो दम तोड़ रहे हैं। जैसे नमदा, गब्बा और वाग्गूव। इनकी बाजार में जबरदस्त मांग है। देश में ही नहीं, विदेशों में भी। लेकिन सही पहचान और मार्केटिंग न मिलने से इनके कारीगरों को उनकी मेहनत का दाम नहीं मिल पा रहा था।

कश्मीर पश्मीना, हाथ से बुने कालीन, कानी और सोजनी शॉल जैसे हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स तो पहले से ही दुनिया में मशहूर हैं। अब जीआई क्यूआर कोड सिस्टम इन लुप्तप्राय शिल्पों को भी उसी कतार में लाकर खड़ा कर देगा। इससे न सिर्फ उत्पाद की विश्वसनीयता बढ़ेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत भी कई गुना बढ़ जाएगी।

कारीगरों को नाममात्र फीस में मिलेगा जीआइ लेबल

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ही हाल ही में नए रूप में तैयार इस क्यूसीडी प्रयोगशाला का उद्घाटन किया था। लैब को आधुनिक बनाया गया है। इसमें हाई-रिज़ॉल्यूशन डिजिटल माइक्रोस्कोप और अन्य जरूरी अत्याधुनिक उपकरण लगाए गए हैं, जो बारीकी से धागे और कारीगरी की जांच कर सकेंगे।

इस लैब के आधुनिकीकरण के लिए पैसा कपड़ा मंत्रालय की राष्ट्रीय हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम योजना और यूटी कैपेक्स बजट से दिया गया है। बता दें कि अभी तक ये सुविधा कश्मीर के गैर-जीआई हस्तनिर्मित उत्पादों की लेबलिंग के लिए ही इस्तेमाल हो रही थी।

विभाग ने इसे अपनी क्षमता निर्माण और बेहतर पैकेजिंग जैसी पहलों के साथ जोड़ते हुए कहा है कि इससे पारंपरिक कारीगरों को बड़े बाजारों तक पहुंचने में मदद मिलेगी और उनके उत्पादों की ब्रांड वैल्यू मजबूत होगी।

विभाग ने सभी कारीगरों, बुनकरों और हितधारकों से अपील की है कि वे अपने योग्य उत्पादों की जीआई लेबलिंग के लिए क्यूसीडी प्रयोगशाला में आएं। इसके लिए बहुत ही मामूली यूजर चार्ज रखा गया है ताकि हर छोटे से छोटा कारीगर भी इसका फायदा उठा सके।