जम्मू-कश्मीर: हिमालयन स्नो ट्राउट के संरक्षण में स्कास्ट-कश्मीर की बड़ी कामयाबी, कैप्टिव ब्रीडिंग तकनीक विकसित
शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कश्मीर (SKUAST-K) ने संकटग्रस्त हिमालयन स्नो ट्राउट (खोंट) के कृत्रिम प्रजनन और लार्वा पालन क ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर में हिमालयन स्नो ट्राउट के संरक्षण में बड़ी सफलता स्कास्ट-कश्मीर ने विकसित की कैप्टिव ब्रीडिंग तकनीक।
HighLights
स्कास्ट-कश्मीर ने हिमालयन स्नो ट्राउट की प्रजनन तकनीक विकसित की।
यह तकनीक मछली संरक्षण और पुनर्स्थापन में सहायक होगी।
आवास क्षरण और प्रदूषण से घट रही थी स्नो ट्राउट आबादी।
राज्य ब्यूरो, जम्मू। जम्मू-कश्मीर में स्वच्छ पानी की मछलियों के संरक्षण की दिशा में एक बड़ी और ऐतिहासिक सफलता मिली है। शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कश्मीर (SKUAST-K) के वैज्ञानिकों ने संकटग्रस्त हिमालयन स्नो ट्राउट, जिसे कश्मीर में स्थानीय स्तर पर खोंट के नाम से जाना जाता है, के कृत्रिम प्रजनन और लार्वा पालन की मानकीकृत तकनीक विकसित कर ली है।
यह महत्वपूर्ण उपलब्धि विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ फिशरीज की डिवीजन ऑफ फिशरीज रिसोर्स मैनेजमेंट तथा फिश जेनेटिक्स एंड बायोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने हासिल की है।
वैज्ञानिकों के अनुसार इस तकनीक से भविष्य में तीन बड़े लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी - कैप्टिव सीड उत्पादन, नदियों में मछलियों का पुनर्स्थापन और घटती जंगली आबादी का संरक्षण। अनुसंधान दल का नेतृत्व फैकल्टी ऑफ फिशरीज के डीन प्रो. फारूक अहमद भट ने किया।
लैब में ऐसे मिली सफलता
वैज्ञानिकों ने नियंत्रित परिस्थितियों में परिपक्व स्नो ट्राउट ब्रूडस्टॉक का अनुकूलित हार्मोनल प्रोटोकॉल के माध्यम से सफलतापूर्वक प्रजनन कराया। प्रयोग के दौरान निषेचन, अंडों से बच्चे निकलने और लार्वा के जीवित रहने की अच्छी दर दर्ज की गई, जिससे यह साबित हो गया है कि कैप्टिव परिस्थितियों में भी इस प्रजाति के गुणवत्तापूर्ण बीज का उत्पादन संभव है।
क्यों जरूरी थी तकनीक?
स्नो ट्राउट की प्राकृतिक आबादी पिछले कुछ वर्षों में लगातार खतरे में है। इसके प्रमुख कारणों में आवास का क्षरण, जल प्रदूषण, नदी तल में खनन, निर्माण गतिविधियां, अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक प्रजनन स्थलों में व्यवधान शामिल हैं।
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कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों से मछलियों की मृत्यु की घटनाओं की रिपोर्ट के बीच इस तकनीक का विकास और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पांजनाथ नाग (काजीगुंड), शेरबाग, गांदरबल और अनंतनाग के वेरीनाग सहित कुछ क्षेत्रों में मछलियों की मौत की घटनाएं सामने आई हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि इन घटनाओं के कारणों का पता लगाने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।
सबसे बड़ी चुनौती को किया पार
वैज्ञानिकों के अनुसार कैप्टिव ब्रीडिंग लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रहा है। इसकी विशेष आवासीय आवश्यकताओं और प्राकृतिक प्रजनन मौसम के दौरान झेलम नदी में परिपक्व ब्रूडस्टॉक की सीमित उपलब्धता के कारण कृत्रिम प्रजनन में कठिनाइयां आती रही हैं। अब विकसित मानकीकृत प्रोटोकॉल इस प्रजाति के बीज उत्पादन के लिए एक भरोसेमंद आधार उपलब्ध कराता है।
HADP के तहत विकसित हुई तकनीक
यह तकनीक समग्र कृषि विकास कार्यक्रम (HADP) के तहत विकसित की गई है। इससे भविष्य में नदी पुनर्स्थापन कार्यक्रमों को गति मिलने और जंगली मछली भंडार पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है। साथ ही, यह कश्मीर की स्थानीय जलीय जैव विविधता के संरक्षण और सतत मत्स्य पालन को मजबूत करने में भी सहायक साबित होगी।
स्कास्ट-कश्मीर के वीसी प्रो. नजीर अहमद गनई ने वैज्ञानिकों को इस उपलब्धि पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि कश्मीर की स्थानीय जलीय जैव विविधता को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने विश्वास जताया कि अनुसंधान संस्थानों, मत्स्य विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच निरंतर सहयोग से कैप्टिव सीड उत्पादन को प्रभावी संरक्षण और पुनर्स्थापन कार्यक्रमों में बदला जा सकेगा।
विश्वविद्यालय ने कहा कि यह उपलब्धि जम्मू-कश्मीर के ठंडे पानी वाले मत्स्य संसाधनों और जलीय जैव विविधता के संरक्षण के लिए विज्ञान आधारित और टिकाऊ समाधान विकसित करने की उसकी प्रतिबद्धता को और मजबूत करती है।