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    जुलाई में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में खूब बरसे बादल, सामान्य से 35 प्रतिशत अधिक बारिश

    Updated: Sun, 09 Aug 2026 07:07 AM (IST)

    जुलाई में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में सामान्य से 35% अधिक बारिश हुई, लेकिन इसका वितरण असमान रहा, जिससे कुछ क्षेत्रों में बादल फटने और बाढ़ जैसी घटनाएं ...और पढ़ें

    जुलाई में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में खूब बरसे बादल। फाइल फोटो

    जुलाई में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में खूब बरसे बादल। फाइल फोटो

    HighLights

    1. जुलाई में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख में 35% अधिक बारिश दर्ज।

    2. बारिश का वितरण असमान, कहीं बादल फटे, कहीं कम।

    3. जम्मू 55%, कश्मीर 71%, लद्दाख 297% अधिक वर्षा।

    जागरण संवाददाता, जम्मू। जुलाई माह में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में मानसून ने जमकर बारिश कराई। पूरे क्षेत्र में सामान्य 192.6 मिलीमीटर के मुकाबले 259.7 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य से 35 प्रतिशत अधिक है। हालांकि, इस अतिरिक्त बारिश का वितरण पूरे क्षेत्र में समान नहीं रहा।

    कई स्थानों पर मूसलधार बारिश, बादल फटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं सामने आईं, जबकि कुछ ही दूरी पर स्थित इलाकों में बारिश बेहद कम रही। मौसम विज्ञान विभाग के निदेशक मुख्तार अहमद के अनुसार, जुलाई में बारिश का स्वरूप काफी स्थानीय रहा।

    विशेष रूप से ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में कम समय में तेज बारिश हुई। कई स्थानों पर बादल फटने जैसी घटनाओं के कारण अचानक बाढ़ और भूस्खलन की स्थिति बनी। कुछ मौकों पर ओलावृष्टि और तेज हवाओं ने भी मौसम का मिजाज बदला। मुख्तार अहमद ने बताया कि यह मौसम गतिविधि मुख्य रूप से मानसूनी हवाओं और कमजोर पश्चिमी विक्षोभ के आपसी प्रभाव से बनी।

    इन मौसम प्रणालियों के कारण कम समय में तेज बारिश के हालात बने, लेकिन ऐसी व्यापक मौसम प्रणालियां कम ही बनीं, जो पूरे कश्मीर में समान रूप से बारिश करा सकें। मार्च के बाद कई दौर में बारिश होने के बावजूद कई क्षेत्रों, खासकर मैदानी इलाकों में बारिश की कमी बनी रही। यही वजह है कि पूरे क्षेत्र में औसत आंकड़ा सामान्य से अधिक होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर बारिश का वितरण काफी असमान रहा।

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    जम्मू संभाग में 55 फीसदी अधिक बारिश

    भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार जम्मू संभाग में जुलाई में सामान्य 204.5 मिमी के मुकाबले 317.8 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से 55 प्रतिशत अधिक है। रामबन में सबसे अधिक बारिश दर्ज की गई। यहां सामान्य 127.9 मिमी के मुकाबले 287.2 मिमी बारिश हुई, जो 125 प्रतिशत अधिक है।

    ऊधमपुर में सामान्य 402.9 मिमी के मुकाबले 839.7 मिमी बारिश दर्ज की गई, यानी 108 प्रतिशत अधिक। इसी तरह सांबा में 91 प्रतिशत, राजौरी में 88 प्रतिशत और पुंछ में 47 प्रतिशत अधिक बारिश हुई।
    वहीं डोडा, जम्मू और रियासी सामान्य वर्षा की श्रेणी में रहे।

    इन जिलों में बारिश का अंतर क्रमशः 17, 3 और 14 प्रतिशत रहा। कठुआ में सामान्य से 25 प्रतिशत कम और किश्तवाड़ में 16 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। कश्मीर में बारामूला सबसे आगे कश्मीर संभाग में जुलाई में सामान्य 52.5 मिमी के मुकाबले 89.9 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से 71 प्रतिशत अधिक है।

    बारामूला में सामान्य 57.3 मिमी के मुकाबले 151.9 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से 165 प्रतिशत अधिक है। इसके बाद गांदरबल में 110 प्रतिशत और पुलवामा में 108 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। अनंतनाग और श्रीनगर में भी सामान्य से 71 प्रतिशत अधिक बारिश हुई।

    इन चारों जिलों में बारिश सामान्य से 60 प्रतिशत से अधिक रही। इसलिए इन्हें बहुत अधिक बारिश वाली श्रेणी में रखा गया। कुलगाम में 51 प्रतिशत, बांडीपोरा में 33 प्रतिशत और कुपवाड़ा में 32 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई।

    बडगाम में छह प्रतिशत अधिक बारिश हुई, जो सामान्य श्रेणी में रही। इसके विपरीत, शोपियां कश्मीर का एकमात्र जिला रहा जहां बारिश में कमी दर्ज की गई। यहां सामान्य 99.2 मिमी के मुकाबले केवल 59.8 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से 40 प्रतिशत कम है।

    लद्दाख में सामान्य से 297 प्रतिशत अधिक बारिश

    लद्दाख में जुलाई के दौरान बारिश ने चौंकाया। यहां सामान्य 6.5 मिमी के मुकाबले 25.8 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य से 297 प्रतिशत अधिक है।

    क्या है सामान्य से अधिक और कम बारिश का पैमाना

    मौसम विभाग के अनुसार सामान्य वर्षा से 19 प्रतिशत तक का अंतर सामान्य माना जाता है। 20 से 59 प्रतिशत की कमी को कम बारिश, जबकि 60 प्रतिशत या उससे अधिक कमी को बहुत कम बारिश की श्रेणी में रखा जाता है।

    इसी तरह 20 से 59 प्रतिशत अधिक बारिश को अधिक और 60 प्रतिशत या उससे अधिक बारिश को बहुत अधिक बारिश की श्रेणी में माना जाता है।

    इस तरह जुलाई में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का औसत भले ही सामान्य से काफी ऊपर रहाए लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि बारिश का असली चेहरा स्थानीय स्तर पर बेहद असमान रहा। कहीं बादल फटे तो कहीं बादल बरसे ही नहीं।