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जम्मू-कश्मीर में कितने रोहिंग्या-बांग्लादेशी? कागजों में 5 हजार, जमीन पर 14 हजार, असली संख्या पर घमासान

Published: Tue, 13 Oct 2026 08:31 AM (IST)

जम्मू-कश्मीर में रोहिंग्या और बांग्लादेशी अवैध प्रवासियों की संख्या को लेकर विवाद गहरा गया है। कागजों में 5 हजार जबकि ...और पढ़ें

रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की संख्या पर सवाल।

रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की संख्या पर सवाल।

HighLights

  1. जम्मू में रोहिंग्या-बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या पर विवाद।

  2. कागजों में 5 हजार, जमीन पर 14 हजार रोहिंग्या होने का दावा।

  3. जनसांख्यिकी बदलाव, सरकारी जमीन पर कब्जों की चिंता।

जागरण संवाददाता, जम्मू। जम्मू में रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी का मुद्दा फिर गरमा उठा है। कश्मीर में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने की कार्रवाई के बाद जम्मू में भी ऐसे अभियान की मांग उठने लगी है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से हो रहे अनियंत्रित बसाव से सरकारी जमीन पर कब्जों, बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं पर दबाव और जनसांख्यिकी में बदलाव की आशंकाएं बढ़ी हैं।

कितने रोहिंग्या हैं जम्मू-कश्मीर में

बता दें कि श्रीनगर में तीन हजार से अधिक बांग्लादेशी नागरिकों के मौजूद होने के दावे के बाद हड़कंप मचा हुआ है। जम्मू में रोहिंग्या नागरिकों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आ रहे हैं।

अकेले जम्मू में हैं 14 हजार रोहिंग्या

जानकारी के अनुसार, आंकड़ों में इनकी संख्या पांच हजार बताई जाती है, जबकि सूत्रों का दावा है कि अकेले जम्मू जिले में 14 हजार रोहिंग्या रह रहे हैं। नरवाल, बठिंडी, चौआदी, छन्नी रामा, सुंजवां, तालाब तिल्लो और सिदड़ा सहित कई इलाकों में इनकी बस्तियां होने की बात कही जाती है।

हालांकि, इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। वर्ष 2021 में सत्यापन अभियान के दौरान 270 से अधिक रोहिंग्या नागरिकों को हिरासत में लेकर हीरानगर होल्डिंग सेंटर में रखा गया था। इसके बाद भी उनकी कानूनी स्थिति और वापसी का मामला चर्चा में रहा है।

कब्जों और दस्तावेजों की जांच जरूरी

स्थानीय लोग राजकुमार, मोहित का आरोप है कि कुछ बस्तियां सरकारी और वन भूमि पर बसाई गई हैं। आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और बिजली-पानी के कनेक्शन की वैधता पर सवाल उठाए जाते रहे हैं।

आरोपों की पुष्टि जांच के बाद हो सकती है। आधार कार्ड अपने आप भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है। रोहिंग्या नागरिकों के पास यूएनएचसीआर के पहचान पत्र होने से उन्हें भारतीय नागरिकता या स्थायी निवास का स्वतः अधिकार नहीं मिलता।

फिर उनकी पहचान, कानूनी स्थिति और वापसी की प्रक्रिया लागू कानूनों के अनुसार पूरी करनी होगी। प्रशासन को वास्तविक संख्या स्पष्ट करने, दस्तावेजों की जांच करने और कब्जों पर कार्रवाई के लिए योजना बनानी चाहिए।

तथ्य-आधारित कार्रवाई से ही सुरक्षा संबंधी चिंताओं और स्थानीय लोगों की शिकायतों का समाधान संभव है। भाजपा इसे जनसांख्यिकी बदलाव की साजिश बता डिपोर्टेशन की मांग कर रही है।

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