'बजट कमी का बहाना बनाकर कर्मचारियों के लाभ नहीं रोक सकते', हिमाचल हाई कोर्ट का फैसला; कहा- खैरात नहीं यह हक है
हिमाचल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पैसों की कमी का बहाना बनाकर कर्मचारियों के रिटायरमेंट लाभ नहीं रोके ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का परिसर। जागरण आर्काइव
HighLights
हाई कोर्ट ने रिटायरमेंट लाभ को अधिकार बताया।
पैसों की कमी का बहाना अस्वीकार्य, कोर्ट का आदेश।
यूनिवर्सिटी को 4 हफ्तों में भुगतान करने का निर्देश।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पैसों की कमी का बहाना बनाकर कर्मचारियों के रिटायरमेंट बकाया को नहीं रोका जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि रिटायरमेंट लाभ खैरात नहीं अधिकार हैं। अदालत ने डॉ. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ बागवानी एवं वानिकी (नौणी सोलन) को आदेश दिया है कि वह अपने याचिकाकर्ता 26 रिटायर्ड कर्मचारियों को 4 हफ्तों के भीतर (4 नवंबर 2026 तक) उनकी लीव एनकैशमेंट का भुगतान करे। ऐसा न करने पर यूनिवर्सिटी को वास्तविक देय तिथि से 5 फीसदी सालाना ब्याज देना होगा।
26 याचिकाओं पर सुनवाई
न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ ने यह फैसला डॉ. कमल शर्मा और अन्य कर्मचारियों द्वारा दायर 26 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। सुनवाई के दौरान यूनिवर्सिटी ने कोर्ट में माना था कि उसने मई 2024 के बाद से रिटायर हुए कर्मचारियों को लीव एनकैशमेंट नहीं दी है।
आर्थिक तंगी का दिया हवाला
यूनिवर्सिटी का कहना था कि सरकारी मदद कम मिलने और आर्थिक तंगी के कारण वह भुगतान नहीं कर पा रही है। कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया।
खैरात नहीं, कर्मचारियों का हक
हाई कोर्ट ने कहा कि पेंशन या रिटायरमेंट के लाभ कोई खैरात या इनाम नहीं हैं, बल्कि यह कर्मचारियों का कानूनी हक है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि रिटायरमेंट के बाद समय पर वित्तीय लाभ मिलना संविधान के आर्टिकल 21 के तहत सम्मान से जीने के अधिकार का हिस्सा है। यूनिवर्सिटी को पहले से पता था कि कर्मचारी कब रिटायर हो रहे हैं, इसलिए फंड का इंतजाम समय पर करना उनकी जिम्मेदारी थी।
