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    'रेगुलर करने में देरी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन', हिमाचल हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के हक में सुनाया अहम फैसला

    By Rohit Nagpal Edited By: Rajesh Sharma
    Updated: Mon, 10 Aug 2026 06:20 PM (IST)

    हिमाचल हाई कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के अनुबंध लेक्चरर्स को राहत दी है। कोर्ट ने कहा कि शिक्षकों को नियमित करने में देरी उनके मौलिक अधिकारों का उल्ल ...और पढ़ें

    हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला परिसर। जागरण आर्काइव

    हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला परिसर। जागरण आर्काइव

    HighLights

    1. अनुबंध शिक्षकों को नियमित करने में देरी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन।

    2. हाई कोर्ट ने आचार संहिता के बहाने को खारिज किया।

    3. शिक्षकों को 1 अप्रैल 2024 से नियमित वेतनमान व लाभ।

    विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग में कार्यरत लेक्चरर्स स्कूल न्यू को बड़ी राहत देते हुए उनके पक्ष में निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुबंध अवधि पूरी होने के बाद प्रशासनिक देरी या चुनाव आचार संहिता के बहाने शिक्षकों को नियमित करने में देरी करना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर व न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने मोहिंदर सिंह व अन्य शिक्षकों की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। 

    देरी से किया नियमित

    याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति वर्ष 2021 में अनुबंध आधार पर लेक्चरर स्कूल न्यू के पद पर हुई थी। सरकार की नीति के अनुसार, 31 मार्च 2024 तक दो वर्ष की निरंतर अनुबंध सेवा पूरी करने वाले कर्मचारी नियमित होने के पात्र थे। याचिकाकर्ताओं ने यह अवधि नवंबर-दिसंबर 2023 में पूरी कर ली थी। इसके बावजूद शिक्षा विभाग ने लोकसभा चुनाव व उपचुनाव की आचार संहिता का हवाला देते हुए उन्हें देरी से छह जुलाई 2024 को नियमित किया।

    शिक्षकों ने सरकार की उस नीति (क्लाज 9) को चुनौती दी थी, जिसके तहत नियमितीकरण केवल आदेश जारी होने की तिथि से (यानी भविष्य के प्रभाव से) लागू किया जाता था। 

    राज्य सरकार ने खारिज की दलील

    कोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि आचार संहिता के कारण देरी हुई। कोर्ट ने कहा कि आचार संहिता समाप्त होने के बाद सरकार को "पुनर्स्थापन के सिद्धांत" का पालन करते हुए देय तिथि से लाभ देना चाहिए था। कोर्ट ने नियमितीकरण नीति की शर्त नंबर नौ को याचिकाकर्ताओं के मामले में अप्रभावी और अमान्य घोषित कर दिया। कहा कि यह शर्त कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन करती है और राज्य सरकार मर्जी से इसमें देरी नहीं कर सकती।

    स्थापित परंपराओं से हटकर याचिकाकर्ताओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह याचिकाकर्ताओं को उनकी पात्रता की देय तिथि (पहली अप्रैल 2024) से नियमित कर्मचारी का दर्जा दे। साथ ही उन्हें एक अप्रैल 2024 से नियमित वेतनमान, वेतन निर्धारण और सभी लाभ दिए जाएं।

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